यम – नियमों का पालन करने से दुराचार, दुर्गुणों एवं विकारों का नाश

अष्टांग – योग

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यम – नियमों का पालन करने से दुराचार, दुर्गुणों एवं विकारों का नाश

महर्षि पतंजलि के अनुसार योग के आठ अंग हैं , इन्हें अष्टांग - योग कहा जाता है। यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान और समाधि ,ये योग के आठ अंग हैं।

इन आठ अंगों में से पहले पांच को बहिरंग और शेष तीन को अन्तरंग कहा जाता है। बहिरंग बाहर की क्रियाओं पर आधारित होता है , जबकि अन्तरंग अंत:करण पर आधारित होती हैं। योग में अन्तरंग को ' संयम ' भी कहा गया है।

अनेकों व्यक्ति ध्यान करने और समाधि लगाने की चेष्टा करते हैं , परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती। इसका कारण यह है कि समाधि की सिद्धि के लिए यम- नियमों के पालन की विशेष आवश्यकता है। यम- नियमों के पालन के बिना ध्यान और समाधि का सिद्ध होना अत्यंत कठिन है।

चित्त की एकाग्रता के बिना ध्यान और समाधि नहीं हो सकती। यम और नियम आधार हैं , जिस प्रकार आधार के बिना नींव मजबूत नहीं होती , उसी प्रकार यम नियम योग के प्राथमिक एवं महत्त्वपूर्ण अंग हैं।

यम- नियमों में भी जो यमों का पालन न करके केवल नियमों का पालन करना चाहता है , उससे नियमों का पालन भी अच्छी तरह नहीं हो सकता। मनुस्मृति के अनुसार -- " यमान सेवेत सततं न नित्यं नियमान बुध:। यमान पतत्यकुर्वाणो नियमान केवलान भजन ॥ " अर्थात बुद्धिमान पुरुष नित्य-निरंतर यमों का पालन करता हुवा ही नियमों का पालन करे , केवल नियमों का नहीं , जो यमों का पालन न करके , केवल नियमों का पालन करता है; वह साधन-पथ से गिर जाता है।

अत: योग की सिद्धि चाहने वाले को यम- नियमों का साधन अवश्य करना चाहिए। इनसे अनेक प्रकार के विकार दूर हो जाते हैं तथा मन निर्मल हो जाता है। यम- नियम से रहित व्यक्ति ध्यान - समाधि की बात तो दूर प्राणायाम भी उचित प्रकार से नहीं कर पाता।

यम – नियमों का पालन करने से दुराचार, दुर्गुणों एवं विकारों का नाश हो जाता है। अत: प्राणायाम – साधक को भी प्रथम यम- नियमों का ही पालन करना चाहिए। इसके अनंतर ही योग के अन्य अंगों की साधना करनी चाहिए। जो साधक योग के आठ अंगों का अनुपालन करता है , उसका अंत:करण पवित्र होकर साधना के पथ पर चल पड़ता है। उसे निश्चित रूप से निस्संदेह आत्म – साक्षात्कार हो जाता है।


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