यमराज :बचपन से युद्ध क्षेत्र तक….! रावण की त्रैलोक्य विजय -46

यमराज :बचपन से युद्ध क्षेत्र तक….!
Ravan-Chap46
रावण की त्रैलोक्य विजय -46
यमराज एक दुर्घर्ष योद्घा थे।वे नीति और न्याय के पक्षधर थे,अतः सम्मान से उनको धर्मराज भी कहा जाता था।यमराज और रावण के बीच जिस अति भयंकर युद्ध की कथा हम कहने जा रहे हैं..! उससे अधिक महत्वपूर्ण है, उनके ही जीवन की कथा, जिसको हम जानने जा रहे हैं। यमराज का बचपन बहुत कष्ट और उपेक्षा में बीता। वे थे तो विवस्वान (विष्णु) के पुत्र,किंतु उनका वास्ता छाया नाम की जिस विमाता से पडा़,उसने यम की एक टांग ही तोड़ दी थी।

विवस्वान (विष्णु) बारह भाई थे। वरुण सबसे बड़े और विष्णु सबसे छोटे। यमराज और यमी जुड़वां भाई बहिन थे।आर्य इतिहास के महामान्य पुरुष मनु, जिनको वैवस्वत मनु कहा गया है, यम के बडे़ भाई थे।यूरोपीय देशों में जिन नेस्टरडम महोदय के नाम से भविष्य वाणियों का हवाला देकर चमत्कृत किया जाता है। वे नेस्टरडर,वास्तव,में ऋग्वेद वर्णित अति प्रतिष्ठित वैज्ञानिक,चिकित्सक,योद्धा महान ज्योतिषी और भविष्यवक्ता नास्तय और दस्त्र (नेस्टरडम) ही थे।

यह दोनों विष्णु हरि के जुड़वां पुत्र थे। जिनका संयुक्त नाम अश्विनी कुमार था। उनकी माता का एक नाम अश्विनी था। हालांकि अश्विनी को ही संज्ञा भी कहते थे ।इन्हीं का एक नाम रेणु था। समग्र रूप से देखा जाये तो मनु,यम -यमी तथा अश्विनी कुमार सगे मा जाये भाई बहन थे। और श्रुतिकर्मा (शनि), ताप्ती आदि संज्ञा की नौकरानी छाया (जिसको सावर्णि कहकर मूल तथ्य को छिपाया गया है) की संतान थीं। इस कथा को मैं विष्णु की आत्मकथा "क्षीरसागर शयनम में लिख भी चुका हूँ। विष्णु की यह पत्नी संज्ञा, रेणु अथवा अश्विनी दैत्यों के सुरक्षा सलाहकार संजीवनी विद्या के जनक महान वैज्ञानिक शुक्राचार्य की नातिन थी। आजकल जो क़ुर्दिस्तान है, वह रेणु का मायका था। विश्वकर्मा रेणु के पिता थे। खैर यह अंतर्कथायें इतनी अधिक रोचक और गहरी हैं कि हम इन पर महीनों तक लिख पढ़ सकते हैं। किंतु यहां हम को संक्षेप में यमराज और रावण के लोमहर्षक,भीषण युद्ध से अधिक नारद के लगे लूथरेपन और ब्रह्मा जी की कूटनीति की चर्चा भी करनी है।
दोनों दियों में तेल देने में कुशल नारद ,अब यम की सभा में हैं। यम से बोले...!पितृराज सुनिये -"मैं बहुत महत्वपूर्ण बात बता रहा हूंँ। आप तत्काल उसके प्रतिकार की तैयारी कर लीजिये।यद्यपि आपको जीतना तो कठिन है, परन्तु निशाचर रावण,अपनी शक्ति के मद में आपको जीतने आ रहा है। मुझको पता है कि आपके पास कालदंड रूपी आयुध है।(यह तब के विश्व का सबसे घातक दिव्यास्त्र,था।हालांकि यहां नारद यम को उकसाने की दृष्टि से ही कालदंड की याद दिला रहे थे)।अब तक रावण यमलोक में पहुंच ही चुका था।

पुष्पक के उतरते ही यम की शत्रु संहारिणी सेना ने विमान पर ही आक्रमण कर दिया। महर्षि बाल्मीकी ने युद्ध दृश्य का लगभग आंखों देखा मिनिट टू मिनिट का हाल लिखा है।यहां मार्के की बात तो यह है कि अभी यमराज तो अपने पदवाचक सेनानायक-मृत्यु और काल के साथ युद्ध भूमि में पहुंचे ही नहीं,पदातियों ने ही रावण को असहज कर दिया।किसी अन्य युद्ध की शुरूआत में ही रावण और उसकी विशाल सेना की दुर्गति कहीं हुई हो, सुना नहीं। रावण लहूलुहान हो गया। सेना मैदान छोड़ने लगी। चारों ओर कोलाहल। मारो काटो। छोड़ना नहीं।नरमुंड, खून की नदियों के दृश्य दिखाई देने लगे। किंतु...! संघर्ष में अद्वितीय,जिजीविषा वाला दुस्साहसी रावण सम्हल गया। हालांकि यम की सेना ने भी स्थिति का आकलन करके रावण को ही केन्द्रित किया था।सारे आक्रमण रावण पर।

रावण ने युद्ध में अद्भुत तरीके से वापसी की। उसने धनुष और बाण हाथ में लिये। कुपित रावण ने वह पाशुपात्र छोडा़, जिसके प्रयोग से इतनी भयंकर लपटें निकलतीं थीं कि दूर दूर तक सब कुछ जल भुन कर स्वाहा हो जाता है। तारों ,बारूद,गैस और पाइप से चलने वाले पाशुपात्र ने तबाही मचादी। यम की सेना जल मरी। जो भाग सकी वह भाग भी गई।चीख,पुकार और सर्वत्र कोलाहल से आकाश गूंज उठा। रावण के इस प्रबल पराक्रम ने यम को भी विचलित कर दिया।वैसे यमराज अभी युद्धक्षेत्र में आये ही नहीं हैं।

 

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


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