यूपी पुलिस माफिया अतीक अहमद को गुजरात की साबरमती जेल से लेकर उत्तर प्रदेश पहुंचने वाली है. इस 1300 किलोमीटर के सफ़र में काफिला जब भी रुखा, तो अतीक के माथे पर मौत का डर साफ़ दिखाई दिया.

 

पुलिस क्यों अतीक को यूपी लेकर आई हैं. इसके बारे में जानने के लिए आपको पूरे 17 साल पीछे जाकर 25 जनवरी साल 2005 को हुए ‘राजू पाल हत्याकांड’ के बारे में जानना होगा.

जानिए पूरा मामला-

राजू पाल उस समय बहुजन समाज पार्टी के विधायक थे. 25 जनवरी के दिन दिनदहाड़े उन्हें प्रयागराज की सड़कों पर गोली मार दी गई थी. उमेश पाल, इस हत्याकांड के मुख्य गवाह थे. करीब एक साल बाद गवाही रोकने के लिए 28 फरवरी 2006 को उमेश पाल का अपहरण कर लिया गया.

समय आगे बढ़ा तो फिर एक दिन साल 2007 में उमेश पाल ने प्रयागराज के धूमनगंज थाने में अपहरण का केस दर्ज करवाया. उमेश पाल ने शिकायत में बताया था कि 28 फरवरी 2006 को अतीक अहमद और उसका भाई अशरफ कुछ लोगों के साथ आया और अपहरण कर अपने दफ्तर ले गया. वहां जमकर मारपीट कर गवाही देने पर जान से मारने की धमकी देने लगा. इस मामले में पहले पांच लोगों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज करवाया गया था. 

उस समय यूपी में मायावती की सरकार बन गई थी. फिर जाँच आगे बढ़ी तो ‘उमेश पाल अपहरण मामले’ में कई लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया. अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ सहित कुल 11 लोगों को नामजद किया गया था.

17 साल बाद क्या मिलेगा इंसाफ़-

करीब 17 साल बाद 28 मार्च 2023 यानी कल इसी केस के सिलसिले में अतीक अहमद को स्पेशल एमपी/एमएलए कोर्ट में व्यक्तिगत तौर पर पेश किया जाएगा. उमेश पाल अपहरण केस में अब कल फैसला सुनाए जाने की उम्मीद तो हैं. पर बता दें कि ये वहीं उमेश पाल हैं जिनको हाल ही में 24 फरवरी के दिन दिनदहाड़े गोलियों से इस तरह छाननी कर दिया था कि मौके पर ही मौत हो गई थी.

अब उमेश पाल हत्याकांड पर कयास तो यहीं लगाये जा रहे हैं कि अतीक अहमद के इशारे पर ही उन्हें दिनदहाड़े गोलियों से छाननी कर दिया गया था ताकि वो कोर्ट में गवाही न दे सके. लेकिन जानकारी के मुताबिक, हत्या से एक दिन पहले ही उन्होंने कोर्ट में अपना बयान दर्ज करवा दिया था.  

फ़िलहाल, हत्यारे फरार तो वहीं उमेश पाल अब जिंदा नहीं हैं. लेकिन उनका परिवार इंसाफ की उम्मीद लिए योगी सरकार की तरफ नजरें गड़ाए बैठा हैं.