उपचुनाव पार्टियों से ज्यादा नेतृत्व के लिए अहम.. सरयूसुत मिश्रा
मध्यप्रदेश में चारों उपचुनाव में जीत के लिए भाजपा और कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. एक लोकसभा और 3 विधानसभा उपचुनाव के परिणाम से न तो केंद्र की सरकार पर फर्क पड़ने वाला है और न ही विधानसभा उपचुनाव परिणाम का राज्य की सरकार पर कोई असर पड़ेगा. फिर भी दोनों दलों के नेताओं ने उपचुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है. उपचुनाव के परिणाम पार्टियों से ज्यादा दोनों दलों के नेतृत्व के लिए अहम हैं. उपचुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बूस्टर डोज का काम करेंगे. परिणाम कांग्रेस के खिलाफ आते हैं, तो नेतृत्व परिवर्तन का मुद्दा गरमा सकता है.अचानक सत्ता गंवाने के बाद कमलनाथ राज्य की राजनीति में इसी आशा के साथ टिके हुए हैं कि अगले चुनाव में कांग्रेस सत्ता में लौट सकती है और उस सरकार का नेतृत्व कमलनाथ ही करेंगे. चारों उपचुनाव के परिणाम कमलनाथ की आशाओं की दिशा और दशा का संकेत करेंगे. सत्ता से उतरने के बाद से ही राज्य कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठती रही है. पार्टी के युवा नेता आलाकमान को यह संदेश दे रहे हैं कि राज्य में भाजपा के मुकाबले के लिए युवा नेतृत्व की जरूरत है. कमलनाथ का छिंदवाड़ा के अलावा राज्य के दूसरे क्षेत्रों में कोई व्यापक जनाधार नहीं है.
वह नेता कम कारपोरेट मैनेजर ज्यादा लगते हैं .कांग्रेस और कमलनाथ ने 15 महीने के शासन में जिस ढंग से काम किया है, उसका अंदाजा तो उनकी सरकार के पतन से ही लगाया जा सकता है. विपक्ष के रूप में कांग्रेस और कमलनाथ का परफॉर्मेंस नहीं के बराबर है. कांग्रेस जन आंदोलन से तो दूर हो ही गई. केवल ट्विटर और सोशल मीडिया पर सक्रियता कांग्रेस पार्टी की लाज बचाए हुए हैं. उपचुनाव के परिणाम भाजपा नेतृत्व के लिए भी अहम और महत्वपूर्ण हैं. वर्ष 2003 के बाद से, कमलनाथ के 15 महीने की सरकार को छोड़ दें, तो राज्य की सरकार का नेतृत्व भाजपा कर रही है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जनता के बीच सबसे लोकप्रिय नेता हैं. उनकी चुनाव जिताऊ नेता के रूप में खासी छवि है. दमोह की हार के बाद यह चारों उपचुनाव की जीत मुख्यमंत्री की चुनाव जिताऊ छवि को और मजबूत करेंगे. भाजपा का पार्टी संगठन भी युवा नेतृत्व के हाथ में है . संगठन और सरकार के बीच तालमेल का भी पार्टी को लाभ मिल रहा है.
भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए खंडवा लोकसभा के चुनाव परिणाम महत्वपूर्ण हैं. उन्हें विधानसभा के चुनाव परिणामों से तो इतना फर्क नहीं पड़ता, लेकिन खंडवा के नतीजे खिलाफ गए तो केन्द्रीय नेतृत्व चौकन्ना हो जाएगा. खंडवा लोकसभा परंपरागत रूप से भाजपा की सीट मानी जाती है. पिछले 7 लोकसभा चुनाव में 6 बार भाजपा विजयी होती रही है. कांग्रेस के अरुण यादव वर्ष 2009 में चुनाव जीत सके थे. खंडवा लोकसभा सीट पर ओबीसी और आदिवासी काफी महत्वपूर्ण हैं. इस लोकसभा क्षेत्र में आदिवासी मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा है. इस सीट पर 40% मतदाता एससी एसटी वर्ग से हैं. इसके बाद खंडवा लोकसभा सीट पर लगभग 26% ओबीसी वोटर हैं. सामान्य वर्ग के मतदाताओं की संख्या लगभग 20% है.
भाजपा ने इस सीट से ओबीसी के ज्ञानेश्वर पाटिल को प्रत्याशी उतारा है. कांग्रेस के प्रत्याशी राजनारायण सिंह पूरनी सामान्य वर्ग से आते हैं. कांग्रेस ने लोकसभा के प्रत्याशी चयन में लगता है गलती कर दी है. चुनाव की तैयारी अरुण यादव कर रहे थे और ऐन मौके पर पार्टी की अंदरूनी राजनीति के चलते वह चुनाव मैदान से हट गए और पूरनी मैदान में आ गए. खंडवा सीट पर कांटे की टक्कर है लेकिन चुनावी गणित भाजपा के पक्ष में झुका हुआ लगता है. भाजपा का पलड़ा भारी दिखाई पड़ रहा है. राज्य का भाजपा नेतृत्व इस सीट को हर हालत में जीतना चाहता है, क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व के सामने इससे उसकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी. विधानसभा उपचुनाव में जोबट आदिवासी सीट है. रैगांव एससी सुरक्षित सीट है. पृथ्वीपुर सामान्य वर्ग की सीट है. पृथ्वीपुर और जोबत कांग्रेस के खाते में थी और रैगांव में भाजपा विधायक के निधन के कारण चुनाव हो रहे हैं. भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने अपने खाते की सीटें बचाने में सफल हो गए तो मैच टाई हो जाएगा. वैसे मध्य प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए एकतरफा चुनाव परिणाम की उम्मीद कम लगती है. उपचुनाव का चुनावी मैच बराबरी पर सिमट सकता है.