कड़े अक्सर तथ्यों के करीब लाते हैं या बातों को प्रमाणिक बनाते हैं। लेकिन कई बार आंडके खुश करते हैं और कई आ बार खिन्ना। बावजूद बदलती दुनिया और इंटरनेट व आईटी के जमाने में बात आंकड़ों, पृष्ठभूमि पर आसानी से की जाती हैं। जाहिर है कि अब किसी से जवाब मांगना पहले की तुलना में आसान है। इसीलिये जवाब भी बहुत सतर्कता मांगते हैं ताकि यह असंतोष में न बदल पाएं।
दरअसल हाल में संसद में केंद्रीय कृषि मंत्री ने बताया है कि सरकार के पास दिल्ली की सीमाओं पर कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान मरने वाले किसानों का कोई रिकॉर्ड नहीं है। उनका यह जवाब आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों के लिए विपक्ष द्वारा मुआवजे की मांग से जुड़ा है। मंत्री ने कहा है कि चूंकि सरकार के पास किसानों की मौत का कोई रिकॉर्ड नहीं है, ऐसे में, आर्थिक सहायता देने का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि यह भी आश्चर्य नहीं कि सरकार किसानों की मौत के बारे में नहीं जानती।
मगर यह विषय विवेचना को तो हो सकता है कि प्रशासन को देश में चल रही मुख्य घटनाओं की कितनी सूचना हैं। इससे पहले सरकार का वह जवाब भी चर्चित थे कि देश में ऑक्सीजन की कमी की वजह से कोई मौत नहीं हुई या लॉकडाउन के दौरान दुर्घटनाओं में कितने लोग मारे गये, यह रिकार्ड नहीं है। माना जा सकता है कि वह जवाब भी महज एक सरकार का जवाब नहीं था, तमाम राज्य सरकारों ने भी अपने स्तर पर यही माना था कि ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई। इसी पृष्ठभूमि में प्रशासन की समग्र अलोकप्रिय छवि को समझा जा सकता है। लेकिन यदि आंकड़े भी राजनीति का
आधार बनने लगे तो कई बार तथ्य और तर्क भी गलत राह में जा सकते हैं। मसलन कोई कह रहा है कि भारत में कोरोना की वजह से चार लाख मौतें हुई हैं, तो कई आरोप लगा रहा है कि पचास लाख की जान गई है। इसमें कोई दोराय नहीं कि केंद्र व राज्य सरकारों को हमेशा अपने स्तर पर आंकड़ों को दुरुस्त रखना चाहिए। जिस महाविपदा से हम सभी गुजर हैं, वह मामूली नहीं थी और तथ्यों की गडबड पर भावी पीढ़ियां हमें कोसेंगी।
जहां तक किसानों की बात है तो उनके नेता कह रहे हैं कि आंदोलन के दौरान सिंधु, टिकरी व गाजीपुर सीमा पर कृषि कानूनों का विरोध करने वाले 700 से ज्यादा किसान अब तक जान गंवा चुके हैं। संभव है कि दावों में अतिरेक हो। मगर मौसम की मार, बीमारियों, गंदगी व आत्महत्या के कारण हुई मौतों की जांच करके आंकड़ा सामने रखना चाहिए। क्या स्थानीय थानों के पास आंकड़े नहीं होंगे। क्या किसानों पर निगरानी की जिम्मेदारी किसी अधिकारी को नहीं दी गई थी।
यदि दावे गलत हैं तो भी प्रशासन को सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी फर्जी खबर या आंकड़ा प्रचारित न हो। किसान काफी दिनों से यह आंकड़ा चला रहे हैं और मुआवजे की मांग कर रहे हैं। जब किसानों से बातचीत होगी, तब यह आंकडा फिर मुद्दा बनेगा, अधिकारियों को पूरे आंकड़ों के साथ बैठना होगा। मगर कई बातें साथ चलती हैं मगर साथ में दिखती नहीं। मसलन सरकार तो ब्यूरोक्रेसी के सहारे काम करती है लेकिन जब वोटो की बात आती है तो राजनीतिक दल भावनाओं को तवज्जो देते हैं मगर सरकार को चलाने के लिये ऐसे तकनीकी कारण बड़े हो जाते हैं जो सकारात्मक हों।