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जनता पर प्रतिमाएं थोपना बंद करें सरकारें…..अतुल पाठक 

अतुल विनोद अतुल विनोद
Updated Fri , 20 Apr

सार

देश में चौक चौराहों पर प्रतिमाएं लगाना नया प्रचलन नहीं है। आजादी के बाद से ही महात्मा गांधी की प्रतिमाएं चौक चौराहों पर लगाई जाती रही, इसके बाद नेहरू जी की एंट्री हुई, फिर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी चौक चौराहों पर स्थापित किए जाने लगे। 

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विस्तार

हाईकोर्ट ने ठीक ही किया जो 2013 के बाद मध्यप्रदेश के चौराहों पर लगी प्रतिमाओं का हटाने का आदेश दे दिया। अच्छा होता कि उन सभी प्रतिमाओं को हटा दिया जाता जो राजनीतिक दलों की सरकार ने जनता पर थोपी हैं।

चौक चौराहों पर लगी महापुरुषों की प्रतिमाओं पर आम जनता का ध्यान शायद ही जाता है। ऐसी प्रतिमाएं लगाने से जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता। अपने अपने राजनीतिक दलों के नेताओं की प्रतिमाएं लगाना भले ही राजनीतिक दलों की सरकार को फायदे का सौदा लगता है, लेकिन इसका कोई खास असर आम मनोविज्ञान पर पड़ता दिखाई नहीं देता। 

देश में चौक चौराहों पर प्रतिमाएं लगाना नया प्रचलन नहीं है। आजादी के बाद से ही महात्मा गांधी की प्रतिमाएं चौक चौराहों पर लगाई जाती रही, इसके बाद नेहरू जी की एंट्री हुई, फिर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी चौक चौराहों पर स्थापित किए जाने लगे। 

बीजेपी की सरकार आई तो बीजेपी से जुड़े हुए महापुरुषों की प्रतिमाएं लगाई जाने लगी। कोई भी सरकार इसमें पीछे नहीं रही। मायावती ने तो खुद की प्रतिमाएं ही बनवा दी। अपनी पार्टी का प्रतीक हाथी स्थापित करने के लिए सरकारी धन के सात हजार करोड़ फूंक दिए। 

चौराहों पर मनमाने ढंग से प्रतिमाएं लगाना भारतीय राजनीति की सबसे बेतुकी सोच है। जिन राजनेताओं महापुरुषों और महानायकों की प्रतिमाओं को चौक चौराहों पर लगाया जाता है उनके प्रति शायद ही आम जनता में सहानुभूति होती होगी। 

अब तो महात्मा गांधी के प्रति भी देश की जनता में उतनी सहानुभूति नहीं रही। होता यह है कि जो भी महापुरुष किसी खास विचारधारा से जुड़ा होता है उसकी विरोधी विचारधारा भी मौजूद होती है। ऐसे में कोई भी महापुरुष निर्विवाद नहीं रहा।

चाहे वह धार्मिक नायक हो, सामाजिक या राजनीतिक जनता का एक वर्ग उसे पसंद करता है तो दूसरा नापसंद। प्रतिमाओं को चौक चौराहे पर लगाकर दिनभर ट्रैफिक की झंझट अलग है।