मैनपुरी में बीजेपी की तरफ से जो उम्मीदवार मैदान में है वे खुद को नेताजी का राजनीतिक शिष्य बता रहे हैं. तो वहीं बहू डिंपल यादव मुलायम सिंह की सीट और परिवार की विरासत बचाने के लिए चुनावी मैदान में हैं. समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव 5 दिसंबर को होगा और नतीजा 8 दिसंबर जारी किया जायेंगे. इसके लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है.

डिंपल यादव ने भरा नामांकन

यादव परिवार की विरासत कहीं जाने वाली मैनपुरी सीट के लिए सपा की तरफ से डिंपल यादव ने सोमवार को नामांकन पत्र दाखिल किया. उसके बाद बीजेपी उम्मीदवार रघुराज शाक्य ने बुधवार 16 नवंबर को नामांकन पत्र दाखिल कर कहा कि 'नेताजी मेरे राजनीतिक गुरु हैं, उन्हीं के आशीर्वाद से भाजपा को वोट मिलेगा.

सपा से शुरू हुआ था बीजेपी उम्मीदवार का राजनीतिक सफ़र-

मैनपुरी सीट पर लंबे समय से यादव परिवार का कब्ज़ा हैं. रघुराज शाक्य भी 1999 में पहली बार और दूसरी बार 2004 में इटावा लोकसभा सीट से सपा की टिकट पर चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंचे थे. साथ ही 2012 में इटावा सदर सीट से सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर उन्होंने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी.

फिर लंबे समय बाद 27 जनवरी 2017 को रघुराज शाक्य ने पार्टी के सभी पदों से यह कहते हुए इस्तीफ़ा दे दिया कि मुलायम सिंह यादव को विवादों के चलते अपमानित किया जा रहा हैं. कुछ समय बाद ही उन्होंने पार्टी से भी इस्तीफ़ा दे दिया था.

इस्तीफ़े के बाद रघुराज शाक्य शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. लेकिन यहां पर भी उनका राजनीतिक सफ़र काफ़ी लंबा नहीं रहा क्योंकि वह 7 फ़रवरी 2022 को बीजेपी में शामिल हो गए.

रघुराज शाक्य ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत ही नेताजी के मार्गदर्शन में की थी. इसलिए वह पार्टी से जुदा होने के बाद भी उनकी विरासत में पहुंचकर उन्हें अपना राजनीतिक गुरु बता रहें है. शायद इसका फायदा चुनाव में बीजेपी को मिल सकता है.

बता दें कि दोनों ही उम्मीदवारों ने नामांकन से पहले सैफई जाकर मुलायम सिंह को श्रद्धांजलि दी और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया. उसके बाद ही उन्होंने नामांकन पत्र दाखिल किया.

यादव परिवार के लिए बड़ी चुनौती, जानिए क्यों?

वैसे ये चुनाव यादव परिवार के लिए काफ़ी अहम हैं क्योंकि सियासत में विरासत संभाले रखना बड़ी ज़िम्मेदारी भी होती हैं और बेशक, कठिन चुनौती भी..! वैसे बदलते वक्त के साथ सियासत भी बदलती है और तमाम चेहरे भी लेकिन सियासी गुणाभाग और समीकरणों के चलते कुछ ऐसी भी सीटें होती है, जिनकी ड्योढ़ी पर हर दौर में एक ही घर या परिवार का कब्ज़ा रहता हैं. धीरे धीरे यही कब्जा, विरासत का नाम ओढ़ लेता है.

विरासत किसी को भी तोहफ़े में नहीं बल्क़ि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनकर जनता के आशीर्वाद से ही मिलती हैं. मैनपुरी सीट उन्हीं में से एक है जो लोकसभा उपचुनाव के कारण काफ़ी चर्चा में हैं. वैसे ये सीट राजनीतिक नज़रिए से यादव परिवार की विरासत कहलाती हैं. जानिए क्यों?

मैनपुरी सीट कैसे बनी विरासत-

अगर मैनपुरी के राजनीतिक इतिहास की बात करें तो इसी सीट से 1996 में मुलायम सिंह यादव लोकसभा पहुंचे थे. इसके बाद 1998-99 में सपा के टिकट पर बलराम यादव ने जीत हासिल की थी. फिर 2004 में मुलायम सिंह चुनाव जीते लेकिन सीएम बनने के कारण उन्हें ये सीट छोड़नी पड़ी. उसके बाद हुए उपचुनाव में धर्मेंद्र यादव ने जीत हासिल कर परिवार की विरासत को संभाले रखा.

मुलायम सिंह ने 2009 के लोकसभा चुनाव में फिर जीत हासिल कर सभी को चौंका दिया और अगला 2014 का चुनाव मैनपुरी और आजमगढ़ से लड़कर दोनों ही जगह सफल रहें लेकिन फिर बाद में मैनपुरी सीट छोड़ दी. जिस पर हुए उपचुनाव में तेज प्रताप यादव जीते थे.

मुलायम ने 2019 का लोकसभा चुनाव फिर मैनपुरी सीट से जीता लेकिन निधन के कारण ये सीट अब ख़ाली हो गई हैं. यादव परिवार की विरासत को संभाले रखने की बड़ी ज़िम्मेदारी अब डिंपल यादव पर हैं.

जमीन से सियासत तक का सफ़र- 

22 नवम्बर 1939 को इटावा जिले के सैफई गांव में किसान परिवार के यहां मुलायम सिंह यादव का जन्म हुआ था. गरीब परिवार से आने वाले मुलायम ने जमीन से सफ़र शुरू कर सियासत ने वह मुक़ाम हासिल किया, जो कई नेताओं के लिए सिर्फ़ सपना ही बनकर रह जाता है.

समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव तीन बार यूपी जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं. जमीन से जुड़ा होने के कारण जनता उन्हें प्यार से नेताजी या फिर धरती पुत्र कहकर बुलाती थी. शायद जनता के इसी प्यार ने मैनपुरी सीट को यादव परिवार की विरासत बना दिया. अब देखना ये होगा है कि क्या नेताजी के जाने के बाद भी यादव परिवार अपनी विरासत बरक़रार रख पाता है या नहीं?