भोपाल: देश में सबसे अधिक संरक्षित वन क्षेत्र 31 हजार 98 वर्ग किलोमीटर है. सबसे ज्यादा टाइगर, सबसे अधिक तेंदुए एवं घड़ियाल और अब चीता का इकलौता राज्य होने का गौरव प्राप्त है. इसके साथ ही सच यह भी है कि देश में सबसे अधिक मध्य प्रदेश के जंगल कटते है.

सबसे अधिक अतिक्रमण होते हैं और जंगलों की सुरक्षा में तैनात मैदानी अमले की पिटाई भी सबसे अधिक इसी राज्य में होती है. यही नहीं रहते बन कर्मियों की मौत होती है और पुलिस उनके खिलाफ एफआइआर भी दर्ज करती है. इन सबके बावजूद भी यहां के अफसर मजे में हैं.

वन कर्मियों की पिटाई को लेकर सरकार चुप्पी साधे हुए हैं. उनकी सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं है. मध्यप्रदेश में टिंबर माफिया, अतिक्रमण माफिया, रेत माफिया, शिकार माफिया और खनन माफिया सक्रिय है. विदिशा जिले की लटेरी में हुई घटना के बाद से ही राज्य के वन कर्मियों पर हमले तेज होने लगे हैं.

बुरहानपुर में तो हद हो गई वहां 300 से 400 लोगों का सशस्त्र अतिक्रमणकारियों का झुंड स्थानीय प्रशासन पर भी भारी पड़ रहा है. बुरहानपुर के वन परिक्षेत्र नवरा की वन चौकी बाकड़ी में अतिक्रमणकारियों का झुंड बंदूक ही लूट के ले गए. इस घटना के दूसरे दिन भी वन कर्मियों पर हमले किए गए. स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि निहत्थे वन कर्मियों ने बुरहानपुर के जंगलों में गश्त नहीं कर पा रहे हैं. 

जनवरी- * उमरिया के वन परीक्षेत्र नौरोजाबाद शिकारियों द्वारा में वीट गार्ड सजनिया की पिटाई.
फरवरी- * खंडवा वन मंडल के सीताबेटी मैं अतिक्रमणकारियों द्वारा पत्थर और गोफनो के हमले में चार वन कर्मी घायल.
              * ओबेदुल्लागंज के गौहरगंज में अतिक्रमणकारियों के हमले से वनरक्षक अजय सिंह अहिरवार और वनरक्षक बलराज सिंह घायल.
अप्रैल- * श्योपुर में खनिज माफिया के हमले में वनरक्षक ऋषभ शर्मा और वाहन चालक हसन खान पर जानलेवा हमला.

मई- * विदिशा के गंजबासौदा अंतर्गत उदयपुर बीच में लोहे की रॉड से वनरक्षक शशांक शर्मा पर प्राणघातक हमला.
गुना- * शिकारियों द्वारा गोली चालन में तीन पुलिसकर्मियों की मौके पर मौत.
जुलाई- * सिंगरौली में वनरक्षक संजीव कुमार शुक्ला और सुरेश मिश्रा पर लाठी-डंडों से पिटाई.
            * गुना परीक्षेत्र में वन कर्मियों पर हमले.
अक्टूबर- बुरहानपुर में अतिक्रमण माफिया द्वारा कुल्हाड़ी डंडे गोपाल और पत्थर से हुए हमले में  वनरक्षक बिरेंद्र यादव मांगीलाल कुल्हारी जीतेंद्र कुशवाहा अंकित सिंह राजपूत गंभीर रूप से घायल हुए. यहां तक कि विशेष सशस्त्र बल की बंदूकें छीनने की कोशिश की गई.
*शिवपुरी के सतनवाड़ा रेंज के चितौरा में वन भूमि पर अवैध कब्जे के दौरान डिप्टी रेंजर विष्णु सेन सहित चार वन कर्मियों पर हमला.
नवंबर- बुरहानपुर के वन परीक्षेत्र नवरा की बन चौकी बाकड़ी में अतिक्रमण माफिया द्वारा वन कर्मियों पर हमला.
*अतिक्रमण माफियाओं द्वारा जंगलों की कटाई और वन स्टॉप पर हमले.
दिसंबर- बुरहानपुर के नेपानगर में अतिक्रमण माफियाओं द्वारा जंगल की कटाई और गोफन सेवन कर्मियों पर प्राणघातक हमला. 

हर महीने होती है 2 से 3 वन कर्मियों पर हमले-

संरक्षण शाखा से एकत्रित आकड़ों के मुताबिक वन एवं वन्य प्राणियों की सुरक्षा में हर साल वनकर्मियों के साथ मारपीट के 20-30 प्रकरण दर्ज हो रहे है. पिछले तीन सालों में जंगलों की सुरक्षा में आधा दर्जन वनकर्मियों को अपनी जान तक गंवाने पड़े है.

यही नहीं, विदिशा, रायसेन, गुना, शिवपुरी, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, नरसिंहपुर, बालाघाट, बैतूल, छिंदवाड़ा, सागर, दमोह, बुरहानपुर, वन मंडलों में 2 दर्जन से अधिक वन कर्मचारियों पर माफिया प्राणघातक हमला कर चुके हैं. पिछले 6 महीने से बुरहानपुर वन मंडल में अवैध कटाई कर अतिक्रमण करने का सिलसिला जारी है. 

गृह विभाग के आदेश का पुलिस ही कर रही है उल्लंघन- 

जंगलों की सुरक्षा में पिट रहें वन कर्मियों पर दोहरी मार पड़ रही है. एक तरफ वन माफियाओं द्वारा उन पर हमले हो रहे हैं तो दूसरी तरफ पुलिसकर्मी ही उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर रही है. जबकि असम और महाराष्ट्र में स्पष्ट निर्देश है कि याद बन कर्मियों द्वारा गोली चालन अथवा कोई भी मारपीट की घटनाएं की जाती है तो बिना मजिस्ट्रियल जांच प्रतिवेदन के निष्कर्षों पहले एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी.

मध्यप्रदेश में भी गृह विभाग ने 2009 में एक स्पष्ट निर्देश दिए है की मजिस्ट्रियल जांच प्रतिवेदन आए बिना पुलिस द्वारा वन कर्मियों पर एफ आई आर दर्ज नहीं की जाएगी. राज्य में  इसका उल्टा हो रहा है. लटेरी घटना इसका ताजा उदाहरण है. आत्मरक्षा में वन कर्मियों ने गोली चलाई और उनके खिलाफ मजिस्ट्रियल जांच आए बिना ही एफआईआर दर्ज हो गई. ऐसी ही घटना मुरैना में हुई जहां माफिया से बचने के लिए गोली चालन की गई. परिणाम स्वरूप बंद कर्मियों पर ही एफ आई आर दर्ज हो गई. 

असहाय से नजर आ रहे हैं बल बल प्रमुख- 

प्रधान मुख्य वन संरक्षक ( सं रक्षण) सीके पाटिल अपने मुखिया को कई बार पत्र लिख चुके हैं कि वर्ष 2009 में जारी किए गए गृह विभाग के आदेश का पालन कराने के लिए शासन के मुखिया को पत्र लिखें पर विभाग के मुखिया की ओर से शासन के मुखिया अथवा गृह विभाग के प्रमुख को पत्र नहीं लिखा गया. गृह विभाग अपने ही अफसरों से पूर्व में जारी आदेश का पालन करवाने में नाकाम नजर आ रहा है. 

सरकार भी बन कर्मियों की पिटाई पर चुप-

जंगलों की सुरक्षा में पीट रहे वन कर्मचारी संघ और आला अफसरों द्वारा आसाम और महाराष्ट्र की तरह ही उन्हें बंदूक चलाने का अधिकार दिया जाए. इस मांग को लेकर कई बार सरकार को पत्र लिखा गयाकिंतु सरकार चुप्पी साधे हुए हैं. वोटों की राजनीति में अतिक्रमण हो रहे हैं और सरकार के मंत्री उनको बढ़ावा भी दे रहे हैं. पिछले दिनों शिवराज सरकार के कबीना मंत्री महेंद्र सिंह सिसोदिया का बयान इस बात का जीता जागता प्रमाण है. बुरहानपुर में भी सप्ताह के नेताओं द्वारा अतिक्रमण सिया को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसके कारण यह हमले हो रहे हैं.