अंतरिक्ष से कितना भव्य दिखता है राम मंदिर, ISRO ने शेयर की खूबसूरत तस्वीरें


स्टोरी हाइलाइट्स

Ayodhya Ram Mandir Satelite Images: रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेस एजेंसी इसरो की ओर से ये तस्वीरें करीब एक महीने पहले 16 दिसंबर, 2023 को ली गई थीं. मगर, इसके बाद सेटेलाइट से फोटों नहीं ली जा सकी क्योंकि कोहरा बहुत ज्यादा था.

Ayodhya Ram Mandir Satelite Images: प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी को होनी है. इस समारोह के लिए अयोध्या स्थित राम मंदिर को भव्य आयोजन के लिए पुष्पों और विशेष रोशनी से सजाया गया है.

इस प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले भगवान राम की नई मूर्ति गुरुवार की दोपहर राम जन्मभूमि मंदिर के गर्भगृह में रखी गई. बता दें कि पीएम मोदी समेत कई अन्य गणमान्य अतिथि 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होंगे. वहीं, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अंतरिक्ष से भव्य राम मंदिर की झलक दिखाई है.

इसरो ने ये तस्वीरें अपने स्वदेशी उपग्रहों की मदद से कैप्चर की हैं. इसरो के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) ने रविवार को इसकी तस्वीरें शेयर कीं. इन तस्वीरों में भव्य राम मंदिर देखा जा सकता है. स्पेस एजेंसी द्वारा ली गई इन तस्वीरों में करीब 2.7 एकड़ में फैले भव्य राम मंदिर को देखा जा सकता है.

अयोध्या में निर्माणाधीन राम मंदिर की ये तस्वीरें 16 दिसंबर, 2023 को ली गई थीं. हालांकि, तब से अयोध्या में घने कोहरे के कारण स्पष्ट तस्वीरें लेना मुश्किल हो गया है. इन सैटेलाइट तस्वीरों में दशरथ महल और सरयू नदी साफ देखी जा सकती है. साथ ही अयोध्या का रेलवे स्टेशन भी नजर आ रहा है.

भारत के इस समय अंतरिक्ष में 50 से अधिक उपग्रह-

फ़िलहाल, भारत के पास अंतरिक्ष में 50 से ज्यादा उपग्रह हैं. अगर इसकी क्षमता की बात करें तो ये एक मीटर से कम आकार की वस्तु की भी साफ तस्वीर ले सकती हैं. राम मंदिर निर्माण के कुछ चरणों में भी इसरो की तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. इस भव्य मंदिर के निर्माण में एक बड़ी चुनौती भगवान राम की मूर्ति स्थापित करने के लिए सटीक स्थान की पहचान करना था.

श्रीराम मंदिर ट्रस्ट चाहता था कि मूर्ति को गर्भगृह के अंदर 3x6 फीट की जगह पर ही रखा जाए, जहां माना जाता है कि भगवान राम का जन्म हुआ था. हालांकि, यह कार्य कहने में जितना आसान था, करने में उतना ही कठिन क्योंकि मंदिर का निर्माण इसके विध्वंस के लगभग तीन दशक बाद शुरू हुआ.

हालांकि, बाद में गर्भगृह के भीतर इस सटीक स्थान की पहचान करने के लिए, निर्माण कंपनी के ठेकेदारों ने सबसे परिष्कृत डिफरेंशियल ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (DGPS) आधारित निर्देशांक का उपयोग किया. इसके लिए लगभग 1-3 सेमी के सटीक निर्देशांक तैयार किए गए, जो मंदिर के गर्भगृह में मूर्ति की स्थापना का आधार बने.