भोपाल: एक दशक तक चले कानूनी अंतर्द्वंद के बाद करैरा सेंचुरी का अस्तित्व समाप्त हो गया है. इस संबंध में मंगलवार को राज्य शासन ने सेंचुरी के 202 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल को डिनोटिफाई करने का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है. वहीं राज्य शासन ने पेंच नेशनल पार्क जीवनी के नजदीक 14 वर्ग किलोमीटर में कर्माझिरी सेंचुरी बनाने की अधिसूचना भी जारी कर दी. यानि करैरा सेंचुरी के बदले सिवनी जिले में एक नई सेंचुरी आकार लेगी.

प्रदेश में एकमात्र से करैरा सेंचुरी ऐसी थी, जहां 1 इंच जमीन वन भूमि नहीं थी. यही वजह रही कि सेंचुरी की घोषणा के साथ ही विरोध के स्वर उठने लगे. इसकी मुख्य वजह यह रही कि 32 गांव के किसानों की 202 वर्ग किलोमीटर की भूमि को लेकर 1982 में करैरा सेंचुरी की घोषणा की गई. सेंचुरी बनने के बाद 1995 में किसानों की भूमि के क्रय विक्रय पर रोक लग गई. इसके बाद से ही सेंचुरी की मुखालफत होने लगी.

सोन-चिरैया के दुश्मन बन गए. वर्ष 2000 से करैरा सेंचरी को डी-नोटिफाई करने की मांग उठने लगी. किसानों के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों ने भी विरोध शुरू कर दिया. किसानों और नेताओं के दबाव में राज्य वन प्राणी सलाहकार बोर्ड ने भी वर्ष 2014-15 में करैरा सेंचुरी को डिनोटिफाई करने के प्रस्ताव को मंजूरी देकर केंद्र को भिजवा दिया.

तब से अब तक केंद्र सरकार और राज्य सरकार के वन्य प्राणी सलाहकार बोर्ड के बीच करैरा सेंचुरी को डिनोटिफाई करने का प्रस्ताव झूलता रहा. पिछले दिनों केंद्रीय वन्य प्राणी सलाहकार बोर्ड ने भी अपनी सहमति दे दी. बोर्ड की सहमति के बाद राज्य मंगलवार को करेरा सेंचुरी के अस्तित्व समाप्त करने की अधिसूचना भी जारी कर दी गई.

मार्च में कलेक्टर ने लिखा था पत्र-

22 मार्च 22 को कलेक्टर शिवपुरी ने सीसीएफ माधव नेशनल पार्क और राज्य शासन को पत्र लिखकर आगाह किया था कि करैरा सेंचुरी डिनोटिफाई नहीं किया गया तो कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. पत्र में उन्होंने उल्लेख किया था कि 32 गांव के किसानों में आक्रोश है. वे कभी भी हिंसक हो सकते हैं. कलेक्टर ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया था कि सेंचुरी के चलते 32 गांव के किसान अपनी जमीन क्रय विक्रय नहीं कर पा रहे हैं. यही नहीं, इन गांवों में अधोसंरचना विकास भी नहीं हो पा रहा है.

33 साल का करैरा अभयारण्य-

करैरा में सोन चिरैया की मौजूदगी का पता चलने पर वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1927 के तहत वर्ष 1981 में यहां अभयारण्य की स्थापना की गई थी. 1994 के बाद से यहां फिर कभी सोन चिरैया दिखाई नहीं दिखी. सेंचुरी में पदस्थ रह चुके एसके गुप्ता ने 1994 में विभाग को पत्र लिखकर यह अवगत करा दिया था कि सोन चिरैया दिखाई नहीं दे रही है. गांव के लोगों में असंतोष है.

दरअसल सेंचुरी 1982 में घोषित किया गया. जिस जगह का चयन किया गया, वहां पर 1 इंच जमीन वन विभाग की भूमि नहीं थी. ऐसे में गांव वालों का विरोध लाजमी था. गांव के किसानों के विरोध पर वन विभाग के अफसरों ने कोई ध्यान नहीं दिया. एक वजह यह भी रही कि किसानों के आक्रोश के चलते इक्का-दुक्का सोन चिरैया दिखी भी तो उसको मार दिया गया.

इनका कहना-

करेरा सेंचुरी को डिनोटिफाई कर दिया गया है. अब यहां के किसान अपनी जमीनों की क्रय-विक्रय कर सकेंगे. अब करमझिरी को नई सेंचुरी के रूप में विकसित किया जाएगा. इस संबंध में अधिसूचना भी जारी कर दी गई है. (जेएस चौहान, मुख्य प्राणी अभिरक्षक)