भोपाल: मप्र जंगलों के पहरेदार खतरे में है. कहीं उनके साथ मारपीट हो रही है तो कहीं उनके खिलाफ दबंग मंत्रियों और नेताओं की शह पर एफआईआर दर्ज हो रही है. लटेरी कांड के बाद लकड़ी चोर की मृत्यु पर सरकार द्वारा दिए गए 25 लाख का मुआवजे के बाद से वन माफियाओं के हौसले बुलंद हैं.
बुरहानपुर की घटना इसका ताजा उदाहरण है. वन चौकी से 11 बंदूके लूट कर चले गए. निहत्था चौकीदार उन्हें रोक नहीं पाया. संरक्षण शाखा से एकत्रित आकड़ों के मुताबिक, वन एवं वन्य प्राणियों की सुरक्षा में हर साल वनकर्मियों के साथ मारपीट के 20-30 प्रकरण दर्ज हो रहे है.
पिछले तीन सालों में जंगलों की सुरक्षा में आधा दर्जन वनकर्मियों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी है. यही नहीं विदिशा, रायसेन, गुना, शिवपुरी, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, नरसिंहपुर, बालाघाट, बैतूल, छिंदवाड़ा, सागर, दमोह, बुरहानपुर, वन मंडलों में 2 दर्जन से अधिक वन कर्मचारियों पर माफिया प्राणघातक हमला कर चुके हैं.
पिछले 6 महीने से बुरहानपुर वन मंडल में अवैध कटाई कर अतिक्रमण करने का सिलसिला जारी है. अतिक्रमण माफिया बड़ी संख्या में बुरहानपुर के नेपानगर, नावरा रेंज सहित रेंजों में लगातार अतिक्रमण कर रहे हैं. बुरहानपुर डीएफओ प्रदीप मिश्रा और खंडवा सीसीएफ किंकर्तव्यविमूढ़ बने हुए हैं. खंडवा सीसीएफ प्रभारी मंत्री और अपने विभागीय मंत्री के सेवा में लगे हैं. जबकि बुरहानपुर डीएफओ प्रदीप मिश्रा शिवपुरी वन मंडल में पोस्टिंग के लिए गणेश परिक्रमा कर रहे हैं.
खतरे में 19000 वन कर्मचारियों की जान-
वन कर्मचारी मंच के प्रांत अध्यक्ष अशोक पांडे का कहना है कि लटेरी कांड पर अपराधियों की मृत्यु पर दिए गए 2500000 के मुआवजे के बाद से ही वन अपराध और वन कर्मचारियों का पिटाई का सिलसिला तेजी से बढ़ रहा है. उनका दावा है कि 19000 कार्यपालिक वन कर्मचारियों की जान खतरे में है. उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह न तो बंदूकों के लाइसेंस दे रही है और न ही फ्रंटलाइन वर्ग कर्मचारियों को बंदूक चलाने का अधिकार.
नेता और माफियाओं का गठबंधन-
नेताओं और माफियाओं के बीच जंगल में अतिक्रमण, अवैध उत्खनन और कटाई जैसे संगीन अपराध बढ़ रहे हैं. स्थानीय नेताओं खासकर सत्ता से जुड़े जनप्रतिनिधियों का वरदहस्त प्राप्त होने के कारण वन माफिया के हौसले इतने बुलंद है कि उनके मार्ग में बाधा डालने वाले वनकर्मियों को मौत के घाट तक उतारने में कोई संकोच नहीं करते है.
अलबत्ता महकमे के शीर्षस्थ अधिकारी अपने मैदानी अमले को प्रोटेक्ट करने में संकोच करते है. उनकी ‘की’ पोस्टिंग खोने के भय से वह माफिया के खिलाफ खुलकर न बोल पा रहे है और न ही कार्रवाई करने के लिए सरकार पर दबाव बना पा रहे है.
वन अपराध के महत्वपूर्ण आंकड़े (प्रतिवर्ष)
- कर्मचारियों पर औसतन - 30
- घायल कर्मचारी औसतन - 29
- मृत कर्मचारी औसतन - 2-3
- राजसात वाहन औसतन - 2511
- जप्त वनोपज औसतन - 18-19 हजार
- जप्त वनोपज की कीमत औसतन- 45-48 करोड़
किस सर्किल में कौन माफिया सक्रिय-
बालाघाट- टिम्बर माफिया
बैतूल- अतिक्रमण और टिम्बर माफिया
भोपाल- अतिक्रमण, खनिज और टिम्बर माफिया
छतरपुर- टिम्बर और खनिज माफिया
छिंदवाड़ा- वन माफिया
ग्वालियर- फर्शी-पटिया और खनिज माफिया
होशंगाबाद- टिम्बर माफिया और शिकारी
इंदौर- टिम्बर और अतिक्रमण माफिया
जबलपुर- टिम्बर माफिया
खंडवा- खनिज और अतिक्रमण माफिया
रीवा- खनिज माफिया
सागर- टिम्बर और खनिज माफिया
शहडोल- टिम्बर माफिया और शिकार माफिया
शिवपुरी-खनिज माफिया और अतिक्रमण माफिया
उज्जैन-वन माफिया
किस सर्किल में कौन माफिया सक्रिय-
बालाघाट- टिम्बर माफिया
बैतूल- अतिक्रमण और टिम्बर माफिया
भोपाल- अतिक्रमण, खनिज और टिम्बर माफिया
छतरपुर- टिम्बर और खनिज माफिया
छिंदवाड़ा- वन माफिया
ग्वालियर- फर्शी-पटिया और खनिज माफिया
होशंगाबाद- टिम्बर माफिया और शिकारी
इंदौर- टिम्बर और अतिक्रमण माफिया
जबलपुर- टिम्बर माफिया
खंडवा- खनिज और अतिक्रमण माफिया
रीवा- खनिज माफिया
सागर- टिम्बर और खनिज माफिया
शहडोल- टिम्बर माफिया और शिकार माफिया