राजधानी में झील- तलाबों और बांधों के बावजूद पानी की कमी का मुख्य कारण बेहतर जलप्रबंधन का अभाव और पानी की बेतहाशा बर्बादी रोकने का कोई ठोस सिस्टम न होना भी है। शहर में करीब 10 करोड़ लीटर पानी की रोज बर्बादी हो रही है और नगर निगम प्रशासन इसे बहते देख रहे हैं। जबकि बीते दस वर्ष में हो करीब पांच सौ करोड़ रूपए शहर के वाटर सप्लाई नेटवर्क पर खर्च किए गए इसके बावजूद लीकेज के बाद शहर की आबादी पानी के लिए तरस जाती है।

ऐसे लीकेज के दौरान लाखों गैलन पानी भी व्यर्थ बह जाता है। उल्लेखनीय है कि इन सभी समस्याओं से निपटने के लिए शहर में पांच वर्ष पूर्व शहर के वाटर सप्लाई नेटवर्क पर स्काडा सिस्टम लगाने की योजना बनी थी। वैसे तो इस सिस्टम को आठ माह में लगाया जाना था, लेकिन यह अब भी पूरी तरह से एक्टिव नहीं है। जब पूरी तरह स्काडा सिस्टम लग सकेगा तो चारों जल प्रदाय परियोजना को पूरी तरह से जोड़ा जा सकेगा। जिसके कारण किसी क्षेत्र में पानी की सप्लाई न होने से दूसरे जल स्रोत के पानी को लोगों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। इससे लीकेज के दौरान होने वाली पानी की समस्या पर पूरी तरह से काबू पाया जा सकेगा।

अभी कोलार के साथ है स्काडा

मौजूदा वक्त में इस सिस्टम की सहायता से कोलार परियोजना को करवा परियोजना के साथ जोड़ा गया है। ऐसे में केरवा की सप्लाई बाधित होने पर कोलार की सप्लाई की जाती है। वहीं कोलार सप्लाई बाधित होने पर केरवा के पानी की सप्लाई की जाती है। जबकि इंदौर पूरे वाटर सप्लाई नेटवर्क पर यह सिस्टम लागू कर एक-एक फीट लाइन की मानिटरिंग कर रहा है, जिससे रोजाना दो करोड़ लीटर व्यार्थ बहने वाले पानी को बचाया जा रहा है, जबकि भोपाल में अब भी रोजाना 10 करोड़ लीटर पानी लीकेज के कारण बर्बाद हो जाता है।

कैसे करता है काम

स्काडा का पूरा नाम दरअसल सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डाटा एक्विजिशन सिस्टम एक ऑटोमेशन सिस्टम है। यह किसी भी तरह के सप्लाई नेटवर्क की ऑनलाइन मॉनिटरिंग करता है। इंदौर और भोपाल सहित कई बड़े शहरों में पानी सप्लाई की मॉनिटरिंग करने के लिए इस सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है। इस सिस्टम की सहायता से पानी की पाइप लाइन में लीकेज होने पर या किसी पानी की सप्लाई किसी भी कारण से रुकने पर इसकी जानकारी ऑपरेटर को मिल जाती है। पानी का दबाव कम होने की सटीक जानकारी भी स्काडा के माध्यम से मिलती है।