भोपाल: जीरो नंबर वाले को पास की अंकसूची थमाते हुए एक दो नहीं बल्कि एमबीबीएस के 40 विद्यार्थियों के रिजल्ट में गड़बड़ी करे एक माह भी नहीं बीता था, रिजल्ट में सुधार भी नहीं हो पाया था कि मप्र आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (एमयू) का नया कारनामा सामने आ गया।
लापरवाही की हदें लांघने में हर रोज नए कीर्तिमान बनाने के जज्बे के साथ कार्यालय पहुँचने वाले प्रबंधनने एक मास्टर ऑफ डेंटल सर्जरी (एमडीएस) के विद्यार्थी को बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी (बीडीएस) की डिग्री थमा दी। अपनी इस भयंकर गलती को स्वीकारते हुए जल्द से जल्द पीडि़त विद्यार्थी को उचित डिग्री देने के बजाए एमयू का अकुशल, अदूरदर्शी, अनुभवहीन, संवेदनाविहीन हो चुका प्रबंधन इस मामले में पर्दा डालने में एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है।
हैरानी की बात यह है कि जब इस विद्यार्थी को तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक वृंदा सक्सेना द्वारा एमडीएस की प्रोवीजनल डिग्री दी गई थी। यही नहीं जब इस विद्यार्थी ने डिग्री के लिए आवेदन किया तो अपनी संपूर्ण जानकारी के साथ प्रोवीजनल डिग्री की छायाप्रति भी लगाई लेकिन उसके बावजूद भी एमयू के होनहार अधिकारियों द्वारा इतनी बड़ी लापरवाही कर दी गई।
आपको जानकर हैरानी होगी कि यह त्रुटि केवल एक विद्यार्थी के साथ नहीं हुई है। एमयू सूत्रों की मानें तो इस तरह की त्रुटियाँ न सिर्फ हर रोज सामने आ रही हैं बल्कि एमयू की कार्यपरिषद (ईसी) को इन दिनों त्रुटि संशोधन परिषद कहा जा रहा है। एमयू के होनहार अधिकारी दिन दूनी रात चौगुनी गलतियाँ लगभग हर रोज कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो परीक्षाओं के साथ परीक्षा परिणामों में इस तरह की आपराधिक त्रुटियां कर रहे अधिकारियों को कार्य परिषद के अधिकारी अभयदान देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे।
आलम ये है कि अब तक संबंधितों को न तो कोई शो-कॉज नोटिस दिया गया न हीं कोई अनुशासनात्मक, दण्डात्मक कार्रवाई एमयू प्रबंधन कर पाया है न हीं निकट भविष्य में कार्रवाई करने साम्थ्र्य जुटाता दिखाई पड़ रहा है। एमयू में बेपटरी हुई व्यवस्था के लिए पूरी तरह से अकुशल प्रबंधन को जिम्मेदार बताया जा रहा है जो त्रुटियों में संशोधन तो दूर की बात त्रुटियों के विषय में जवाब देने से बचने मुँह छिपाए हुए है।
यह है मामला
इंदौर की 41 रेडियो कॉलोनी के रहने वाले शकील अहमद के साथ उनकी पत्नी माहे परवीन इन दिनों अपने बेटे डॉ. रुमान अहमद शेख के भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं। पढ़ाई में अच्छे होने के साथ बीडीएस और एमडीएस होने के बावजूद रुमान अपने सहपाठियों के साथ देश भर में कई जगहों पर योग्यता होने के बावजूद भी आवेदन नहीं दे पा रहे हैं। रुमान के परिजनों के साथ सहपाठी भी इसकी मूल वजह और कोई नहीं बल्कि एमयू प्रबंधन की लापरवाही को बता रहे है।
डॉ. रुमान ने बीडीएस के बाद इदौर के मार्डन डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर में ओरल एंड मैक्सीफेशियल सर्जरी में एमडीएस नियमित विद्यार्थी के रूप में अक्टूबर 2020 में फर्स्ट डिविजन से किया। उन्हें तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक श्रीमति वृंदा सक्सेना द्वारा 5 मई 2021 को अध्ययन के दौरान एमडीएस की प्रोवीजनल डिग्री भी दी गई जिसे वर्तमान में डिप्टी रजिस्ट्रार के पद पर पदस्थ पंकज बुधोलिया द्वारा वैरीफाईड भी किया गया था।
परीक्षा फर्स्ट डिविजन से उत्तीण करने के बाद डॉ. रुमान ने 3 अगस्त 2021 को एमपी ऑनलाइन के जरिए डिग्री के लिए 3 हजार रुपए शुल्क अदा करते हुए परमानेंट डिग्री के लिए एप्लीकेश क्रमांक एमडीईजी 2107190029 से आवेदन दिया। उन्होंने इस आवेदन के साथ अपनी प्रोवीजनल डिग्री का प्रमाण पत्र भी संलग्र किया।
इसके बावजूद 1 जुलाई 2022 को उन्हें एमयू के स्वर्णाक्षर में अंकित नाम की एमडीएस के बजाए बीडीएस की डिग्री थमा दी गई, प्रमाण पत्र में लिखा गया कि डॉ. रुमान अहमद शेख मार्डन डेंटल कॉलेज इंदौर के विद्यार्थी है तथा अक्टूबर 2020 में आयोजित अंतिम वर्ष की परीक्षा उतीर्ण करने एवं समस्त पात्रताएं पूर्ण करने के उपरांत इस विश्वविद्यालय द्वारा बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी की उपाधि प्रदान की जा रही है।
प्रमाण पत्र में नीचे तत्कालीन कुलपति के हस्ताक्षर हैं। सीरीयल क्रमांक 643264969058 से जारी इस प्रमाण पत्र को देख कर डॉ. रुमान और उनके परिजनों की स्थिति एक माह से काटो तो खून नहीं जैसी है। वे न तो इस डिग्री का उपयोग कर पा रहे हैं न हीं एमडीएस होने के बावजूद कहीं भी आवेदन कर पा रहे हैं।
संशोधन के बजाए पीडित विद्यार्थी को मिली फटकार-
डॉ. रुमान एमडीएस होने के बावजूद एमयू प्रबंधन द्वारा बीडीएस की डिग्री थमाए जाने के बाद लगातार एक माह से अधिक समय से लगातार एमयू की हैल्पलाईन और वर्तमान परीक्षा नियंत्रक डॉ. सचिन कुचया से फोन पर संपर्क कर सुधार के लिए प्रयासरत हैं। डॉ. रुमान की मानें तो अपनी लापरवाही से हुई इस त्रुटि का ठीकर हेल्पलाइन ऑपरेटरों से लेकर अधिकारियों द्वारा उल्टे उसके ही सर फोड़ा जा रहा है। आलम ये है कि डॉ. रुमान के साथ हुई इस त्रुटि के लिए क्षमा मांगते हुए सुधार की बात कहने के बजाए उल्टे डॉ. रुमान को ही डाँट फटकार लगाई जा रही है जिससे वे काफी सहमे हुए हैं।
एमबीबीएस के रिजल्ट में भी हुई थी त्रुटि-
एमयू ने हाल हीं में 29 जुलाई को एमबीबीएस का रिजल्ट जारी किया। इसमें एक विद्यार्थी की अंकसूची में पीडियाट्रिक्स के इन टोटल में 0 अंक दिए गए हैं इसके बावजूद विद्यार्थी को उत्तीर्ण घोषित कर दिया। पीडियाट्रिक के पेट्रो में पूर्णांक 30 हैं लेकिन कई विद्यार्थियों को पूर्णांक से भी अधिक अंक दे दिए गए। इसी तरह जनरल सर्जरी विषय में विद्यार्थियों को पूर्णांक से अधिक अंक दे दिए गए।
एमयू इससे पूर्व बैचलर ऑफ फीजियोथैरेपी (बीपीटी) में एक छात्रा के बगैर परीक्षा में बैठे उत्तीर्ण की अंकसूची थमा चुका है। एमयू प्रबंधन एमबीबीएस के रिजल्ट को लेकर प्रतिक्रिया देने हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। हालांकि प्रबंधन के कुछ आला अधिकारियों से जहाँ संपर्क नहीं बन पाया वहीं परीक्षा नियंत्रक ने इसकी वजह सॉफ्टवेयर तैयार न होने के कारण 28 हजार विद्यार्थियों के अंक मैनुअली भरे जाने को बताया है।
फिर क्यों प्रतिमाह दिए जा रहे 3 लाख रुपए-
एमयू सूत्रों की मानें तो परीक्षाओं का कार्य वर्तमान में संभाल रही सॉफ्टवेयर कंपनी रिजल्ट के साथ मार्कशीट और डिग्री में अब तक कार्य कर चुकी कंपनियों में गलतियों के मामले में कीर्तिमान स्थापित कर चुकी है। विवादों से घिरी पूर्व कंपनी को एमयू में कथित तौर पर गड़बडिय़ों में सुधार करने के लिए लाए गए तत्कालीन कुलपति ने एक नई कंपनी को यह काम सौंपा।
कंपनी के बुरी तरह विफल होने के बावजूद कंपनी को लाने वाले कुलपति ने बगैर किसी कार्रवाई के एमयू को अलविदा कह दिया। वर्तमान में कार्य कर रही कथित तौर पर त्रुटियों का कीर्तिमान बना रही कंपनी को किसका प्रश्रय है और लगभग हर कार्य कर पाने में अक्षम साबित हुई इस कंपनी के दो कर्मियों को बगैर कार्य के एमयू क्यों प्रतिमाह 3 लाख का भुगतान कर रही है यह समझ से परे हैं।
डीएमई निशांत बरवड़े ने स्वीकृत किया वेतन-
इस मामले में एमयू प्रबंधन के रजिस्ट्रार डॉ. प्रभात बुधोलिया का कहना है कि सॉफ्टवेयर कंपनी के दोनों कर्मचारियों को डायरेक्ट मेडिकल एज्युकेशन आयुक्त डॉ. निशांत बरवड़े के आदेश पर एमयू में पदस्थ किया गया। दोनों को वेतन एमयू द्वारा नहीं बल्कि डीएमई कार्यालय से प्रदान किया जा रहा है।
(इस मामले में प्रबंधन का पक्ष जानने के लिए कुलपति डॉ अशोक खंडेलवाल एवं परीक्षा नियंत्रक डॉ. सचिन कुचया से संपर्क का प्रयास किया गया लेकिन दोनों ही अधिकारियों से संपर्क नहीं हो पाया।)