राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और मुख्यमंत्री गहलोत के बीच की जंग अब निर्णायक मोड़ पर आ गई है। सचिन पायलट के अपनी ही सरकार के खिलाफ अनशन से यह तय हो गया है कि वे चुनाव से पहले बड़ा कदम उठाने को तैयार हैं। उनका अगला कदम क्या होग? क्या वे ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह भाजपा केसाथ आ जायेंगे या कांग्रेस के खिलाफ ममता बनर्जी या जगामन मोहन रेड्डी की तर्ज़ पर नई पार्टी बना ताकत दिखाएंगे? या कांग्रेस से अलग हो उनका सियासी वजूद संकट में आ जाएगा?
ये सभी सवाल सोशल मीडिया की सुर्ख़ियों में हैं। पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने भी इसे लेकर एक ट्वीट किया है, उनका कहना है, कि इस बात की पूरी संभावनाएँ हैं कि सचिन पायलट दूसरी ममता बनर्जी बनने की राह पर हैं। वे जल्द अपनी नई पार्टी का ऐलान कर सकते हैं। ममता बनर्जी बनाम सोमेन मित्रा का इतिहास इस बार राजस्थान की ज़मीन पर दोहराया जा सकता है। 90 के दशक में बंगाल में कुछ ऐसा ही हुआ था। हाईकमान ममता के विरोधी कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सोमेन मित्रा के साथ गया था और जनता ममता के साथ।
इस बात को लेकर @vinodlalsot नाम के यूजर ने लिखा है राजस्थान में कांग्रेस की जड़े इतनी गहरी है की सचिन पायलट और गहलोत दोनो मिलकर भी उखाड़ना चाए तब भी नही उखाड़ पाएंगे और यदि पायलट कांग्रेस से बाहर जाते हैं तो मुश्किल से एक सीट भी नही जीत पाएंगे और राजस्थान छोड़कर यूपी आना पड़ेगा
@kuldpvys नाम के यूजर ने इस पर कटाझ करते हुए लिखा है, कि ममता बंगाल की ही थी, ये मूल रूप से ग़ाज़ियाबाद के हैं, राजस्थान के नहीं। और वैसे भी इनका प्रभाव पूर्वी राजस्थान के एक छोटे से हिस्से तक सीमित है। जो विधायक अभी साथ हैं, वो भी केंद्रीय नेतृत्व के कड़े रुख़ के बाद पाला बदलते एक मिनट भी नहीं लगाएँगे। जल्दबाज़ी ले बैठेगी सचिन को।
खैर जो भी हो राजस्थान की सियासत में सचिन पायलट के अनशन ने भूचाल सा ला दिया है। जहां कांग्रेस पार्टी ने सचिन पायलट को अनशन करने से रोका था और इसे पूरी तरह से पार्टी विरोधी गतिविधि भी करार दिया तो वहीं सचिन पायलट को कई कांग्रेसी विधायकों का भी समर्थन मिल रहा है।
उनका कहना है, कि सचिन BJP की वसुंधरा सरकार के दौरान हुए भ्रष्टाचार के मामलों की जांच को लेकर अनशन कर रहे हैं। तो वहीं सोशल मीडिया पर इस बात की भी चर्चा है, कि वसुंधरा तो केवल बहाना है गहलोत असली निशाना है। सचिन पायलट का अगला कदम क्या होगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।लेकिन सचिन के इस कदम ने गहलोत सरकार की मुश्किलें तो ज़रूर बढ़ा दी हैं।