इन दिनों देश के सियासी फलक पर दो महत्वपूर्ण घटनाक्रम पूरी शिद्दत के साथ चल रहे हैं। उनमें एक तो है 7 सितंबर से शुरू कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और दूसरी है सुशासन बाबू यानी बिहार के सदाबहार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उर्फ मिस्टर- पलटूराम की | विपक्ष को एक मंच पर लाने की मुहिम। राहुल गांधी तो अपनी 150 दिन लंबी यात्रा के दौरान भारत और भारतीयों को समझने तथा उन्हें देश के मोदी राज के मौजूदा हालात को अपने नजरिए से समझाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे उलट नीतीश बाबू पर अलग ही धुन सवार है। बिहार में 17 साल की अपनी मुख्यमंत्रीय पारी के दौरान(बीच में कुछ वक्त के जीतन राम मांझी के कार्यकाल को छोड कर) तकरीबन 14 साल तक जिस भाजपा के कंधे पर सवार होकर उन्होंने बिहार का निजाम चलाया, उसी को वह नेस्तनाबूद कर देना चाहते हैं।

नीतीश बाबू वही हैं जिन्होंने समाजवादी युग के अपने पुराने साथी जिन लालू यादव और उनकी पत्नी राबरी देवी की राष्ट्रीय जनता दल या राजद के 15 साल के राज को भाजपा की मदद से हिलाकर समाप्त करके बिहार के जंगल राज से मुक्ति दिलाई थी। लेकिन अब सुशासन बाबू उन्हें लालू राबरी के वंशज यानी तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का ताज पहना कर खुद प्रधानमंत्री की हसरत पाल बैठे है। हालांकि सार्वजनिक तौर पर वह खुद के पीएम बनने की बात को नकारते आए हैं। उनकी दलील है कि मोदी राज से निजात के लिए सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाना उनका एकमात्र मकसद है। फिर चाहे पीएम कोई भी बने। नीतीश बाबू भले ही कुछ कहें लेकिन बीते ढाई दशक से ज्यादा के वक्त में उन्होंने जो पैंतरे दिखाए हैं, उसको देखकर सब जानते हैं कि वह कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं।

लेकिन सियासत के इस दौर पर उनकी प्रधानमंत्री पद की तमन्ना या यूं कहें कि जयप्रकाश नारायण की तर्ज पर किंगमेकर बनने की हसरत समझ से परे है। देश में वह यह सब तब करना चाह रहे हैं जबकि बिहार में उनकी पार्टी जद यूका का जादू तेजी से उतार पर है। बिहार के सूबाई चुनावी नतीजों को आंकड़ों के आईने में देखा जाए तो इसका साफ पता चलता है। पांच साल तक लालू से संघर्ष करते हुए नीतीश बाबू की जेडीयू ने 2005 में पहली बार भाजपा को एनडीए की छतरी तले आकर लालू की राजद को पहली बार पीछे छेड़ा था।

तब जेडीयू ने 55 भाजपा ने 37 सीटें जीती थीं। लालू की राजद 75 पर आकर टिक गई थी। लेकिन चौथे सबसे बड़े दल लोजपा के रामविलास पासवान के साथ नहीं आने के चलते नीतीश बाबू मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए और राष्ट्रपति शासन लग गया। लेकिन इसी साल दोबारा चुनाव हुए तो पासवान को तगड़ा झटका लगा और नीतीश बाबू की अगुआई में बिहार में एनडीए ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया। जेडीयू 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी तो भाजपा 55 सीटों के साथ दूसरी पायदान पर गई। लालू की राजद 54 पर ठिठक गई।

2010 आते आते सुशासन बाबू के सितारे बुलंदियों पर थे। 2010 के विस चुनाव में एनडीए को 243 में से बंपर बहुमत मिला। जेडीयू की सीटों का आंकड़ा 115 तक जा पहुंचा तो भाजपा भी 91 तक जा पहुंची। राजद मात्र 22 सीटों पर सिमट गई। यानी नीतीश बाबू चाहते तो एनडीए की सरकार बेधडड़पांच साल चलती। लेकिन तभी नीतीश बाबू की हसरतों को पंख लगने लगे। या यूं कहें कि तेजी से बढ़ती भाजपा का डर भी सताने लगा। इसी भ्रमजाल के चलते उन्होंने 2015 के चुनाव के पहले भाजपा से नाता तोड़ा और 22 सीटों पर अपने धुर विरोधी लालू और कांग्रेस को साथ लेकर बीच रास्ते में सरकार बनाकर भाजपा को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

2015 के चुनाव में नीतीश बाबू फिर मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन इस बेमेल गठजोड़ का नुकसान यदि भाजपा को हुआ तो उसके घाव जेडीयू तो भी लगे। नीतीश बाबू की पार्टी पार्टी 81 पर आ गई तो लालू ने 22 से छलांग लगाते हुए 85 पर जा पहुंचे। लालू ने ज्यादा सीटें आने के बावजूद बड़ा दिल दिखाया और नीतीश को मुख्यमंत्री बनाकर अपने बेटे तेजस्वी को उप मुख्यमंत्री बनवा कर संतोष कर लिया। भाजपा बनाम आल के इस चुनाव में मात्र 53 सीटें ही जीत सकी। लेकिन नीतीश कुमार को जल्द समझ में आ गया कि लालू के बेटों और राजद के सहयोगियों के साथ रहते हुए उनका सुशासन बाबू का खिताब खतरे में पड़ गया है। उन्होंने फिर पैंतरा बदला और लालू की गोद को झटकते हुए फिर भाजपा का दामन थाम लिया।

लेकिन 2020 के विस चुनाव में वो उतरे तो बहुमत तो एनडीए को ही मिला लेकिन नीतीश बाबू की विश्वनीयता के तेजी से गिरते ग्राफ के चलते उनकी जेडीयू 45 सीटों पर सिमट गई और उनकी सहयोगी भाजपा 74 पर जा पहुंची। यहां दरियादिली भाजपा ने दिखाई और नीतीश को ही मुख्यमंत्री बने रहने दिया। लेकिन नीतीश ने लालू की तरह भाजपा की पीठ में खंजर घोंपा और एक बार फिर बिहार की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में 75 सीटें जीतने वाली लालू की राजद की गोद में बैठने के बाद लालू के बेटे को सीएम और खुद पीएम बनने की हसरत पाल बैठे हैं।

नीतीश लाख मना करें पर राजद के नेता ताल ठोककर कह रहे हैं कि आगे चलकर तेजस्वी बिहार के मुख्यमंत्री होंगे और नीतीश बाबू देश के पीएम। बिहार में अपनी साख गवां चुके नीतीश बाबू देश की सियासत में दूसरे विपक्षी दलों के भरोसे को कैसे जीतेंगे यह दिलचस्प होगा। नीतीश के पहल पर विपक्षी दलों के पैतरों पर दोपहर मेट्रो के आगे के अंकों में चर्चा होगी।

प्रसंगवश : राजेश सिरोठिया