मप्र के राजनीतिक समीकरणों को सहेजने व संगठन को कसने में जुटे दोनों बड़े सियासी दलों में संगठन की भावी सूरत एक अहम मोड़ की प्रतीक्षा में लग रही है। भाजपा में संगठन चुनाव की सुगबुगाहटें तेज हैं तो कांग्रेस में संगठन चुनाव के बाद अब अध्यक्ष का निर्णायक चुनाव' दिल्ली से भोपाल तक असर डालने वाला साबित हो सकता है। मप्र में सत्तारूढ़ दल भाजपा के नये सूबाई अध्यक्ष को लेकर भी चर्चा चलने लगी हैं, ठीक उसी तरह जैसे दिल्ली में कांग्रेस के भीतर सरगर्मी हैं।

सूत्रों का कहना है कि भाजपा में संगठन के चुनाव यदि हुए भी तो इसमें कुछ महीने लगेंगे। हालांकि जिलों के अध्यक्षों का कार्यकाल पूरा हो चला है। इसीलिए डेढ़ दर्जन के हालिया चुनाव में परफार्मेंस के आधार पर हटाने की भी बात चल पड़ी है। वहीं मौजूदा अध्यक्ष वीडी शर्मा को दूसरा कार्यकाल मिलेगा या नया अध्यक्ष आएगा, इस पर सस्पेंस है। हालांकि चुनाव के कुछ महीने पहले भाजपा क्या चाहेगी, यह चर्चा का विषय है। हालांकि चुनाव का ऐलान अभी बाकी है लेकिन इसकी आहट भर से सत्ता व संगठन के बीच की ट्यूनिंग और मप्र में कैंप करने वाले भाजपा के कई खास संगठन पदाधिकारियों के रुख' को लेकर भी दीनदयाल परिसर के अहातों में कई कयास हैं।

उधर कांग्रेस के कैंप में अक्टूबर में नये राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुने जाने के बाद मप्र के भी कुछ नये समीकरण अस्तित्व में आ जायेंगे। माना जा रहा है कि कमलनाथ के पास कांग्रेस की कमान तो रहेगी लेकिन यदि केंद्र में गैर गांधी अध्यक्ष बना तो मप्र में भी परिस्थितियां थोड़ा करवट लेंगी और कुछ नये व पुराने नेता मजबूत हो सकते हैं। वहीं सूत्र बताते हैं कि गांधी परिवार की ही 'वापसी' यानी राहुल गांधी की दोबारा ताजपोशी के बाद भी मप्र में कुछ बदलाव चुनाव के मद्देनजर जरूर हो सकते हैं। उनकी टीम फिर प्रभावी हो जाएगी। बदलाव चुनाव के मद्देनजर जरूर हो सकते हैं।उनकी टीम फिर प्रभावी हो जाएगी। 

शिवराज टटोल रहे नब्जः

सत्र बताते हैं कि सीएम शिवराज इस वक्त सरकार की योजनाओं और घोषणाओं के साथ ही अपनी कमोबेश हर मुलाकातों को मिशन 23 के नजरिये से ही अंजाम दे रहे हैं। वे जिलों की समीक्षा में भी जनता की सहूलियतों पर जोर दे रहे हैं, इसी तरह वे भाजपा विधायकों से भी फीडबैक ले रहे हैं। आज भी वे नर्मदापुरम और रीवा संभाग के विधायकों से साथ चर्चा कर रहे हैं। 

आदिवासी सीटों पर फोकस बढ़ा

विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा व कांग्रेस ने आदिवासी सीटों के लिये ताकत झोंकी हुई है। पिछले चुनाव में कांग्रेस को आदिवासी क्षेत्रों से खासी बढ़त ने सत्ता की चाबी उसे दी थी। इस बार भाजपा में यह क्षेत्र हथियाने की मुहिम चल रही है। इसके अलावा भाजपा ने नई रणनीति बनाते हुए उन करीब सौ सीट पर खास तौर फोकस किया है, जहां पार्टी पिछली बार हारी थी। इनमें ज्यादातर मालवा निमाड़, ग्वालियर चंबल और बुंदेलखंड क्षेत्र की है। प्रत्येक सीट पर चुनाव होने तक सांसद और विधायकों की जिम्मेदारी तय कर दी गई है।इसमें संगठन की निगरानी में इन नेताओं के नियमित दौरे होंगे, जो बूथ मैनेजमेंट की मॉनिटरिंग करेंगे। आगामी चार सितंबर को भाजपा प्रशिक्षण वर्ग और प्रदेश कार्यसमिति की तारीख तय करने बैठ रही है।

सक्रिय होंगे वीडी और नाथ के जिला प्रभारी 

कांग्रेस ने पहली बार सभी जिलों में विधानसभा चुनाव के लिये प्रभारी बनाए हैं। हालांकि अंदरखाने जिला अध्यक्षों से इनकी ट्यूनिंग को लेकर भी सवाल उभर रहे हैं। लेकिन नाथ ने साफ कर दिया है कि उनके प्रयोगों और निर्देशों को अमल में लाने के लिये जरूरी समन्वय बनाये जायें।इधर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा। अगले सप्ताह से आदिवासी इलाकों के दौरे शुरू कर रहे हैं। वे धार, झाबुआ, खरगोन, बड़वानी आदि जिलों में जा रहे हैं। न क्षेत्रों में पार्टी नेता कार्यकर्ताओं की बैठक होगी। कई जरूरी बदलाव भी संभावित हैं। उपचुनाव के बाद कांग्रेस के पास 96 विधानसभा सीट बची हैं। जबकि भाजपा की सीटें बढ़कर 127 हो चुकी है। प्रदेश में बसपा की दो, सपा की एक और निर्दलीयों के पास चारसीट हैं।