भोपाल: मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग अपने पर्यटकों को लुभाने के लिए जिस नए गीत का सहारा ले रहा है, वह गीत दरअसल मध्य प्रदेश की उल्टी तस्वीर बयां कर रहा है । गीत में विकसित होते मध्य प्रदेश में लालटेन लेकर पात्रों का फिल्मांकन किया गया है। यानी बत्ती गुल राज्य का प्रमोशन....प्रचार की शुरुआत में जन्मों की कथा सुनाई गई है, सात जन्मों का कॉन्सेप्ट बताने की कोशिश करते लोग कंटेंट से दूर जाते दिखते हैं। 

गीत की नायिका उसके नृत्य और  वेशभूषा पर फोकस हैं , मप्र की ब्रॉन्डिंग से दूर राजस्थान को महत्व दे रही है।यही नहीं गीत के निर्माता  ने अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटन और धार्मिक महत्व के अलौकिक स्थल महाकाल लोक को कंटेंट से गायब ही कर दिया है, वहीं मुरैना के 64 योगिनी के उस मंदिर का भी कहीं उल्लेख नहीं है, जिस पर देश की संसद का निर्माण हुआ है ।बहुत जल्दबाजी में और फौरी तौर पर तैयार किए गए इस गीत में मध्य प्रदेश के मुखिया की भावनाएं भी कहीं नजर नहीं आती... अफसरों के प्रयोगों ने अच्छे भले विचार की बलि ले डाली।

पहले विदेशी पर्यटकों के मध्य हिंदुस्तान सांप सपेरे और जानवरो का देश था और अब मध्य प्रदेश को उसी राह पर मध्य प्रदेश पर्यटन द्वारा बढ़ाया जा रहा है। गीत में जानवरों के केन्द्र में रख कर कथा सुनाई जा रही है…

इस प्रचार गीत से पर्यटन स्थलों में सर्वाधिक लोकप्रिय और पर्यटकों की संख्या में देश का नंबर 1 उज्जैन और महाकाल लोक किस साज़िश के तहत गायब कर दिया गया है....?? विज्ञापन में अमरकंटक , चित्रकूट और सांची जैसे दर्शनीय और अति विशिष्ट स्थान का भी कोई जिक्र नहीं है।

कलाकार की वेशभूषा राजस्थान के कालबेलिया नृत्य करने वालों की वेशभूषा या फिर कच्छ भुज की महिलाओं के पहनावे से काफी हद तक मिलता है ।लगता नहीं कि इस प्रकार की ड्रेस या पहनावा मध्य प्रदेश के किसी सेक्टर में हो सकता है वहां कलरफुल होता है खास करके लाल  हरि चुनरी जरूर होती है।

इस जिंगल में पेंच नेशनल पार्क के लिए टाइगर, पन्ना के लिए लंगूर, बांधवगढ़ के लिए तितली, भीमबेटका के लिए चींटी, सतपुड़ा के लिए जातक, खजुराहो के लिए मोर, ओरछा के लिए उड़न गिलहरी ,ओंकारेश्वर के लिए तोता, मांडू के लिए  ग्वालियर, शिवपुरी के लिए मछली ,नर्मदा जी के लिए कछुआ का जन्म लेकर मध्य प्रदेश की सैर करवाइ है। मध्य प्रदेश के अन्य पर्यटन स्थलों के लिए अलग-अलग जन्म में छिपकली सांप कबूतर चिड़िया आदि के वंश में जन्म लेना होगा। गज़ब की कपोल कल्पना की गई है, जो पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए तो कतई उचित नहीं है।