बुंदेलखंड का खान-पान:
बुंदेलखंड के भोजन को लेकर ऐसा माना जाता है कि अतीत में इस इलाके में जंगली फल मेवा (महुआ) और बेर ही लोगों को सहज उपलब्ध थे और इसका स्वाद पसंद किया जाता था। कुछ जगह तो बेर का बहुत ही महत्व था। लोग भोजन खाने से पहले बेर अवश्य खाते थे।
बुंदेलखंड के ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्र में जंगली फल, फूल, पत्ते, कंदमूल, महुआ, अचार, तेंदू आदि खाए जाने की परंपरा काफी प्राचीन है। बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति में ऐसा माना जाता है कि 'जैसा भोजन किया जाएगा, वैसा ही मन हो जाएगा।' इसलिए भोजन को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरती जाती थी।
बुंदेलखंड में लोगों ने मौसम के हिसाब से भोजन में परिवर्तन करना शुरू कर दिया था। फूल और फलों की बजाए उनके रस का भी उपभोग होने लगा। महाभारत काल में दूध और उससे बने पदार्थों मक्खन, छाछ, दही और घी आदि का प्रयोग बढ़ा। इस इलाके पर एक हजार सालों तक नाग, वकाटक और गुप्त नरेशों की पीढ़ियों ने राज किया तब भोजन में कई बदलाव आए।
गेहूं और अन्य से बनी रोटी, कई प्रकार से पकाए गए चावल, गुड़ और अन्य मीठे रसों से बने लड्डू, दूध और उसके अन्य पदार्थ चाव से खाए जाते थे। चंदेलों के राजशासन में शाकाहार को बढ़ावा मिला तो वन्य क्षेत्रों में मांस भक्षण और सुरा पान यथावत रहा। इसके बाद तोमर राजवंश के दौरान आम और इमली के गूदे को पानी में घोलकर बनाया गया मीठा या नमकीन पेय पना या पनौ की शुरुआत हुई। वहीं फलों को मिला कर अनेक प्रकार का दूध का स्वाद लिया जाने लगा। वहीं सिखिसि, मठा और खोवा, दूध आदि मिश्रित कर सुगंधित दूध का पेय बासोंधी भी लोगों ने चखी।
इसी दौरान लोगों ने समोसा खाया और कढ़ी, पकौड़ी, पेराका, डाह आदि बनने लगे। वरा-बरी, लपसी, कसार, कई प्रकार के लड्डू, घेवर, खोवा से बनी मिठाइयां, गुझिया आदि भी पसंद की जाने लगीं। लोगों में खाने के बाद ताम्बुल (पान) खाने का प्रचलन बढ़ा। इसके बाद बुंदेला काल में यहां आम, मिर्च सहित अन्य अचार, पापड़, बरा-मगौरा, कढ़ी के साथ बिजोड़ा या विजारी, भात, दाल आदि का सेवन करने लगे थे। इसके साथ ही हवला, मोहनभोग, खुरमा, खीर, खुरमी, पुआ, मालपुआ, चटनी, रायता आदि पकवान बनने लगे थे।
देहात, कस्बे, टोलों में भोजन का स्वाद वहीं पुराना हुआ करता था, लेकिन कुछ बड़े नगरों में स्वाद में विलासिता आ गई थी। गांव में महुआ से बने मुरका, डुबरी और भुने चने से बना सत्तू तथा बेर से बना बिरचुन आदि भोजन का हिस्सा थे। वहीं मही और चावल से बनी महेरी, सत्तू या बेसन से बनी लपसी, दूध और रोटी से बना मीड़ा लोगों का स्वाद बढ़ा रहे थे।
बुंदेलखंड के कुछ व्यंजन:
पूड़ी (पूरी) के लड्डू बुंदेलखंड में पूड़ी (पूरी) के लड्डू आज भी प्रचलन में हैं। इनके लिए बेसन की बड़ी और मोटी पूड़ियां (पूरियां) तेल में तलने के बाद उनको हथेली की मदद से चूरा कर लिया जाता था. इस चूरे को छलनी से छानने के बाद एक बार फिर घी या तेल में सेंकते हैं। फिर गुड़ या शक्कर की चाशनी या घोल डालकर लड्डू बना लिए जाते हैं। इसमें इलायची या काली मिर्च को मिलाने से स्वाद बढ़ जाता है।
आंवरिया यह एक प्रकार की कढ़ी है जिसमें सूखे हुए आंवले का चूर्ण डाला जाता है। हिंगोरा बिना दही या मही के बनी हुई कढ़ी जिसमें हींग का छौंक लगाकर बनाया जाता है।
बफौरी बुंदेली भाषा में वाष्प को बाफ या भाफ कहा जाता है, इसकी मदद से बफौरी बनाई जाती है। बर्तन में पानी भर कर उसके मुंह पर कपड़ा बांध देते हैं, जब पानी खौलने लगता है तब बेसन की पकौड़ियां सेंकते हैं। इन पकौड़ियों को बाद में धनिया, हल्दी, मिर्ची, लहसुन, प्याज के साथ छौंक लगाकर पकाते हैं। ठोंमर ज्वार के दलिये को मही में पकाकर इसे बनाते हैं। इसमें दूध-गुड़ डाल देने से स्वाद बढ़ जाता है।
एरसे कूटे गए चावलों के आटे गुड़ मिलाकर इसे पूड़ियों की तरह घी में तलते हैं। करार यह एक प्रकार की कढ़ी है जिसमें बेसन की जगह बिना छिलके वाली मूंग दाल को पीस कर मिलाया जाता है। इसी प्रकार हरे चनों (छोले) की बनी कढ़ी भी पसंद की जाती है।