मानसिक स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान दे सरकार...आशीष दुबे


स्टोरी हाइलाइट्स

बीमारी के दौरान लोगों को अकेलापन अधिक सता रहा था और वे सवालों से भरे हुए थे, जिनका समाधान खोजने की कोशिश के तहत उन्होंने जहां भी संभव हुआ, हेल्पलाइन नंबरों पर फोन किया।

मानसिक स्वास्थ्य, भारत में मेंटल इलनेस, भारत में मेंटल प्रॉब्लम्स की स्थिति, भारत में मनोवैज्ञानिक समस्याओं के बढ़ते case..

मानसिक स्वास्थ्य बेहतर करने के जतन कम:

जब हालात बुरी तरह निराश कर देते हैं और उम्मीद की किरण नहीं नजर आती तो लोग कई ऐसे फैसले करने लगते हैं जो सही कतई नहीं कहे जा सकते लेकिन उस वक्त यदि सही सलाह और हौसला उन्हें मिल जाए तो सब कुछ संभाला जा सकता है। 

मौजूदा दौर में जबकि कोरोना जैसी घातक बीमारी ने पैर फैलाए हुए हैं और कहीं लॉकडाउन तो कहीं कर्फ्यू या अन्य प्रतिबंधों का अंदेशा लगा रहता है वहां हेल्पलाइन काफी उपयोगी सिद्ध हो रही है। यह बात हाल में सामने आयी है। जब कोरोना के असर पर शोध किया गया। 

बताया जाता है कि एक व्यापक अध्ययन में उन्नीस देशों के हेल्पलाइन नंबरों पर की गई अस्सी लाख टेलीफोन कॉल पर किया गया। इसमें पाया गया कि पहली लहर के दौरान लोग मानसिक रूप से ज्यादा परेशान थे और लोगों ने मदद मांगने के लिए खूब कॉल किए। 

आत्महत्या के विचार या दुर्व्यवहार जैसे खतरों के बजाय अकेलेपन व महामारी के बारे में चिंताओं ने अधिकांश कॉल करने वालों को फोन करने के लिए प्रेरित किया। विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित विश्लेषण महामारी के दौरान मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों का समाधान करने के लिए किया गया सबसे बड़ा प्रयास माना गया। 

बीमारी के दौरान लोगों को अकेलापन अधिक सता रहा था और वे सवालों से भरे हुए थे, जिनका समाधान खोजने की कोशिश के तहत उन्होंने जहां भी संभव हुआ, हेल्पलाइन नंबरों पर फोन किया। शोध करने वालों ने बताया है कि कोरोना संक्रमण की प्रारंभिक लहर के पहले छह हफ्तों में हेल्पलाइन पर कॉल में ज्यादा वृद्धि हुई थी। हेल्पलाइन नंबरों पर सामान्य दिनों की तुलना में 35 प्रतिशत अधिक कॉल आई थी। 

दरअसल यह लोग किसी न किसी से बात करना चाहते थे, महामारी संबंधी अपनी चिंताओं का इजहार करना चाहते थे। इसके अलावा शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि फांस और जर्मनी में लॉकडाउन के अधिक सख्त होने पर हेल्पलाइन पर आत्महत्या से संबंधित कॉल में वृद्धि हुई थी, लेकिन जब सरकार ने जरूरतमंदों को वित्तीय सहायता का प्रस्ताव किया, तब खुदकुशी संबंधी चिंता कम हो गई। 

भारत जैसे देश में यह गौरतलब तथ्य है, जहां तनाव के दौर में किसानों व छोटे कारोबारियों ने बड़ी संख्या में आत्महत्या की है। संकेत साफ है, अगर किसी भी संकटया महामारी के समय ऐसे लोगों तक आर्थिक सहायता पहुंचा दी जाए, तो आत्महत्या के मामलों को कम किया जा सकता है। 

पश्चिमी देशों में ऐसे श्रमिकों व व्यवसायियों की पर्याप्त मदद की गई है, जो महामारी व लॉकडाउन के समय लाचार हो गए थे। कई देशों ने नागरिकों के इलाज का पूरा खर्च भी खुद किया। जबकि भारत में अपर्याप्त चिकित्सा व्यवस्था ने लोगों को निजी व घोर व्यावसायिक चिकित्सा संस्थानों के भरोसे रहने पर विवश किया और लाखों रुपये फूंके। 

बहरहाल यह शोध परियोजना 2020 में महामारी के शुरुआती दिनों से ही जारी थी, जब शोधकर्ता मानसिक स्वास्थ्य पर महामारी व लॉकडाउन के प्रभाव की निगरानी के लिए रास्ता तलाश रहे थे। शोध दल ने अमेरिका, चीन, लेबनान व 14 यूरोपीय देशों सहित 19 देशों व क्षेत्रों से आंकड़े जुटाए। वैज्ञानिक मानते हैं कि कुल मिलाकर यह शोध मानसिक स्वास्थ्य में बदलाव की निगरानी के लिए सहायक है। 

यह सच है कि मानव समाज में आम तौर पर मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा होती है। दुर्भाग्य से हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिये उतने प्रयास नहीं होते, जितनी दरकार है। हालांकि कुछ सरकारों ने आनंद मंत्रालय जैसे कुछ महकमे गठित किये हैं, इनके नाम अलग हो हैं लेकिन यह लोगों को सकारात्मकता की ओर ले जाने में सहायक हैं। मगर यह प्रयास सरकारी नवाचार दिखाने के साधन ज्यादा नजर आते हैं।


 

आशीष दुबे

आशीष दुबे

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