आज से कोई बीस हजार साल पहले तक की तस्वीरें हमें मिली हैं। ये पहाड़ी गुफाओं की दीवारों पर, शिकार करने के पत्थर, हाथी-दांत, हही या धातु के हथियारों पर खींची हुई हैं। तांबे आदि धातुओं की ऐसी मूर्तियां भी मिली हैं जो आदमी की शक्ल की हैं और पूजा के काम में आती थीं।
भारत में तो मूर्तियों की पूजा बराबर होती ही रही है। पुराने समय में दुनिया के सभी देशों में लोग मूर्तियां पूजते रहे हैं। हर जगह बड़ी तादाद में मूर्तियाँ मिली हैं। बाहर कई कारणों से मूर्ति पूजा बंद हो गई, पर हमारे देश में वह चलती रही और आज भी चल रही है।
मज़े की बात तो यह है कि आदमी आरंभ में जंगली और नंगा रहा है, बिना घर-द्वार के वन-वन भटकता रहा है, पर सुंदर चीजें उसे बराबर अपनी ओर खींचती रही हैं। मूर्तियों का बनना इसी का परिणाम था। यही कला का आरंभ था।
मूर्तियां केवल पूजने के लिए ही नहीं बनीं, खेलने के लिए भी बनीं, और आज हमारे पास बहुत प्राचीन काल के लाखों खिलौने मौजूद हैं। खिलौने-आदमी, जानवर, चिड़िया, मछली, मगर-सभी शक्ल के हैं जो आदमी के द्वारा बनाए गए हैं या सांचों में ढाले गए हैं। कई बार तो इनकी खूबसूरती मन को बरबस मोह लेती है।
मूर्तियां धातु से लेकर मिट्टी तक की बनी हैं- सोना, चांदी, तांबा, पीतल, कांसा, रांगा, कांच, लोहा, हही, हावी दांत, रत्न, लकड़ी, पत्थर, मिट्टी, सभी चीजों की साधारण तौर पर घर में पूजा मूर्ति करने या खेलने के लिए श्रीली मिट्टी की मूर्तियाँ पहले हाथ से ही बना ली जाती थीं, फिर उन्हें धूप में सुखा लेते थे या आग में पका लेते थे।
बाद में ये सांचे में ढली जाने लगीं और देखने में काफी सुंदर भी लगने लगीं। इन मूर्तियों से आज हमारे अजायबघर भरे पड़े हैं। इन मूर्तियों का सिलसिला कई तरह का है और उनकी समझ या जानकारी के लिए उन्हें एक खास क्रम से जानना जरूरी हो जाता है। जैसे किसी मकान को आप नीचे से ऊपर या ऊपर से नीचे देखते हैं, वैसे ही मूर्तियों की जानकारी भी समय के क्रम से करनी चाहिए।