भाई कांग्रेस भी ग़ज़बे है। कहाँ से दिमाग लाती है गुरु। पहले हो हल्ला मचता है। विचार, मंथन,चिंता,नई रणनीति और यहां तक नए नेतृत्व की जमकर बात होती है।और बैठक को लेकर खूब माहौल भी खिंचता हैं लेकिन बैठक के बाद परिणाम निल बटे सन्नाटा। यहां तक कि जो लोग काम काज से लेकर अगुआ को लेकर रोना पीटते हैं वो भी बैठक में पहुंचते ही लमलेट हो जाते हैं। लोकसभा चुनाव से लेकर राज्यों के चुनाव में जो कांग्रेस के हाहाकारी परिणाम सामने आए,उसके बाद बैठक,बदलाव की जमकर नौटंकी मची। हाल में निपटे यूपी चुनाव और निपटी कांग्रेस के बाद G23 से लेकर अन्य नेताओं,कार्यकर्ताओ ने अगुआओं की क्षमता को लेकर गाना गाया।लगा कि भैया,इस बार लोटे में तूफान आएगा लेकिन .बैठक में सबने फिर तय कर लिया कि बिन गांधी खानदान... हम सब अधूरे। खैर वो दिल्ली का मामला था तो अब मप्र में भी यही ड्रामा। 3 अप्रैल की बैठक को लेकर खबरें थी कि तूफान आएगा। कमलबाबू के समर्थको का बीपी भी नसे फाड़ रहा था। विपक्षी दल भी सन्नाटे में था कि भाई होगा क्या? बैठक खत्म हुई। चाय नाश्ते के बाद तड़पते कांग्रेसियों ने तय किया कि...चेहरा तो कमलबाबू का ही बेहतर। अरे भले मानुस..जब औपचारिकता का बिगुल ही बजाना है तो बाहर फड़फड़ाना क्यों? बाहर कार्यकर्ता हैरान परेशान हो ..चल क्या रिया है। खैर यह कांग्रेस का निजी मामला है। लेकिन यह साफ है गुरु कि न कुछ बदला और न बदलेगा। बस भाग्य के भरोसे चुनाव में कूंदेगें। उचक कर लग गई तो ठीक नही तो आपस में अक्का बक्का जारी रहेगा