तेलंगाना हाईकोर्ट ने इस महीने के पहले सप्ताह में राज्य में फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी के उपयोग को चुनौती देने वाली जनहित याचिका में राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। हैदराबाद के सामाजिक कार्यकर्ता एस.क्यू. मसूद द्वारा यह जनहित याचिका दायर की गई थी। दरअसल एस.क्यू. मसूद मई 2021 में अपने काम से घर लौट रहे थे, पुलिस ने उन्हें रास्ते में रोका और उनके चेहरे से मास्क हटाने को कहा और उनकी तस्वीर ले ली। इस पर उन्होंने आपत्ति भी जताई लेकिन पुलिस ने इसे नजरअंदाज कर दिया। अपने तस्वीरों के उपयोग को लेकर चिंतित मसूद ने इस विषय पर पुलिस अधिकारियों के अधिकारों और कार्यों के कानूनी आधार को जानने के लिए हैदराबाद के पुलिस आयुक्त को नोटिस भेजा। आयुक्त की ओर से कोई प्रतिक्रया नहीं मिलने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
सामाजिक कार्यकर्ता मसूद की इस याचिका को पूरे देश में सरकारों द्वारा उपयोग किये जाने वाले फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी के विरोध में एक टेस्ट केस के रूप में देखा जा रहा है। डिजिटल अधिकार कार्यकर्ता मानते हैं कि यह तकनीक गोपनीयता और अन्य बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करती है। कानूनी विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि यह तकनीक निजता के मौलिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।
क्या है फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी?
फेशियल रिकग्निशन एक बायोमेट्रिक तकनीक है, जिसके द्वारा किसी भी व्यक्ति की पहचान की जाती है। यह तकनीक व्यक्तियों की पहचान के लिए चेहरे की विशेषताओं का उपयोग करती है। व्यक्तियों के आँख के रेटिना, नाक, चेहरे के आकार के हिसाब से उसकी पहचान की जाती है। इस तकनीक के माध्यम से किसी भी फोटो, वीडियो, या फिर रियल टाइम में लोगों की पहचान की जा सकती है। यह व्यक्तियों के चेहरों की तस्वीरों और वीडियो के डेटाबेस के आधार पर कार्य करती है। डेटाबेस में मौजूद चेहरों की तस्वीरों से अन्य लोगों के चेहरों का मिलान करके लोगों की पहचान की जाती है। हम अन्य व्यक्तियों के चेहरे को देखते ही पहचान जाते हैं, लेकिन तकनीक डेटाबेस में मौजूद चेहरों का मिलान कर व्यक्तियों की पहचान करती है। इसके डेटाबेस में डेटा को स्टोर और एक्सेस किया जा सकता है। तकनीक एल्गोरिदम स्केल पर कार्य करती है।
विश्वभर में बढ़ता इसका उपयोग
फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी का उपयोग दुनियाभर में अब सामान्य हो गया है, सार्वजनिक सीसीटीवी कैमरों से लेकर हवाईअड्डों को सुरक्षा का हवाला देकर बायोमेट्रिक रिकग्निशन प्रणाली से लैस किया जा रहा है। उपयोग के मामले में तकनीक की बढती संख्या वैश्विक आबादी के आधे हिस्से को छू चुकी है। डिजिटल सुरक्षा पर कार्य कर रही संस्था सर्फशार्क के अनुसार इस तकनीक का उपयोग वर्तमान में 98 देश कर रहे हैं, 12 देशों ने इसके उपयोग की स्वीकृति दे दी है, लेकिन अभी इसे लागू नहीं किया है। 13 ऐसे देश हैं जो इस तकनीक को अपनाने पर विचार कर रहे हैं और 3 देशों ने इसके उपयोग को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया है।
भारत की बात करें तो एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने एक आरटीआई के जवाब में कहा है कि जून 2022 से देश के चार हवाईअड्डों पर फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी का उपयोग शुरू हो जाएगा, जिसमें 165.43 करोड़ रूपये का खर्च आयेगा। वर्तमान सरकार ने इस तकनीक का उपयोग अपने खिलाफ हो रहे आंदोलनों में भी खूब किया है। किसान आन्दोलन से लेकर सीएए (CAA) विरोधी आंदोलनों में इसका खूब उपयोग किया गया है। किसान आन्दोलन के दौरान 26 जनवरी को लाल किले पर हुए हंगामे में शामिल प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए इसका उपयोग किया गया। यूपी पुलिस द्वारा सीएए विरोधी आंदोलनों पर निगरानी रखने के लिए भी इस तकनीक का उपयोग किया गया, जिसके बाद एक हजार से अधिक प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी की गई थी।
वर्तमान में भारत में कोई विशेष कानून नहीं है जो फेशियल रिकग्निशन जैसी टेक्नोलॉजी को लागू करने का अधिकार देता है और ना ही डेटा सुरक्षा को लेकर कोई विशेष कानून है। ऐसी तकनीकों के प्रत्यक्ष उपयोग पर कानून द्वारा मान्यता नहीं दी गई है। भारत की डिजिटल कानून में आईटी एक्ट 2000 को मातृ कानून माना जाता है, लेकिन इस एक्ट में भी इस तकनीक के उपयोग को लेकर कोई बात नहीं की गई है। आईटी एक्ट 2000 के तहत पारित नियमों में भी इससे संदर्भित किसी तरह की कोई चर्चा नहीं की गई है।
क्या है खतरा?
एक्सपर्ट का मानना है कि फेशियल रिकग्निशन जैसी टेक्नोलॉजी हमारे अधिकारों का सम्मान करने में विफल रही है। व्यक्ति का निजी डेटा उनका अपना होता है और उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उनकी व्यक्तिगत जानकारी कब और किस उद्देश्य से संग्रहित की गई है और इसका उपयोग किस प्रकार से किया जाएगा। यह तकनीक हमारे निजी डेटा में घुसपैठ करती है और इस डेटा का उपयोग किस प्रकार से किया जाएगा इस पर ठोस कानून मौजूद नहीं है।
इस तकनीक का उपयोग करके किसी को भी पहचाना जा सकता है, वैसे में नागरिकों के मन में एक भय उत्पन्न हो सकता है, जो सेल्फ सेंसर को बढ़ावा दे सकता है। उदाहरण के लिए जिन लोगों को पता है कि किसी भी विरोध प्रदर्शन में वह शामिल होंगे और उनकी पहचान इस तकनीक के माध्यम से की जा सकती है, उस स्थिति में लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से खुद को और अपने आस-पास के लोगों को भी शामिल होने से रोकेंगे। यह तकनीक उन परिस्थियों में विशेष रूप से खतरनाक साबित होगी जब सरकारें अपनी आलोचना और विरोध में होने वाले आंदोलनों को दबाने के लिए उपयोग करेगी। हाल में भारत के साथ-साथ अन्य देशों की सरकारों ने विरोध प्रदर्शन को कुचलने के लिए इसका उपयोग किया है।
तकनीक का सबसे खतरनाक पक्ष बायोमेट्रिक डेटा है, बायोमेट्रिक डेटा का अपना सुरक्षा जोखिम होता है। हम किसी भी पासवर्ड को निरंतर बदल सकते हैं, इसके विपरीत बायोमेट्रिक डेटा को बदला नहीं जा सकता है। अगर किसी का फिंगरप्रिंट डेटा लीक हो जाता है तो उस परिस्थिति में वह अपने डेटा को रिसेट नहीं कर सकता है, जैसे पासवर्ड के लीक होने पर उसे रिसेट किया जा सकता है। बिना किसी के सहमती के उनके चहेरों को कहीं भी और कभी भी स्कैन किया जा सकता है। इसका मतलब है कि बायोमेट्रिक डेटा जिसे डेटाबेस की एक श्रृंखला में संग्रहित किया जा सकता है, जिनके सुरक्षा उपाय अपर्याप्त हो सकते हैं।
हमारे जीवन को सरल बनाने और सार्वजनिक सुरक्षा को बढ़ाने की क्षमता के लिए यह तकनीक आकर्षक लग सकती है। लेकिन संभावना यह है कि इसके उपयोग से हमारी स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। इसके साथ ही असमानता और भेदभाव को बढ़ावा देने में इसका उपयोग किया जा सकता है। विश्व की सरकारें इसके उपयोग में इजाफा ला रही है और हमारे सामने यह एक संकट के रूप में उभर रहा है। जिस सन्दर्भ में इसका उपयोग अधिकांशतः सरकारें कर रही है वह खतरनाक है। वैसे में फेशियल रिकग्निशन जैसी टेक्नोलॉजी के उपयोग को लेकर सख्त कानून की जरूरत है, जिससे इसके बढ़ते उपयोग पर शिकंजा कसा जा सके।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)