कर्नाटक में जारी हिजाब विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की गई है। याचिका में देश भर के शैक्षणिक संस्थानों में कॉमन ड्रेस कोड लागू करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय का तर्क है कि कॉमन ड्रेस कोड के लागू होने से हिंसा में काफी हद तक कमी आएगी। इतना ही नहीं, इस पहल से धार्मिक माहौल में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे।
हिंसा को कम करने में मदद करेगा :
याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा कि, "सभी के लिए समान अवसर प्रदान करके लोकतंत्र के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने के लिए हमारे गणतंत्र की स्थापना के बाद से सार्वभौमिक शिक्षा की भूमिका को मान्यता दी गई है। सामान्य ड्रेस कोड न केवल हिंसा को कम करता है, बल्कि एक सकारात्मक शैक्षिक वातावरण को भी बढ़ावा देता है। यह सामाजिक-आर्थिक मतभेदों के कारण होने वाली हिंसा के अन्य पहलुओं को भी कम करता है।
स्कूलों के बाधित होने की संभावना कम :
याचिका में कहा गया है कि, कॉमन ड्रेस प्रत्येक छात्र को अपेक्षाकृत समान बनाती है, जिससे स्कूलों में अराजकता की संभावना कम हो जाती है। एक सामान्य ड्रेस कोड छात्रों को अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा। जब छात्र एक ही पोशाक पहनते हैं, तो इस बात की चिंता कम होती है कि प्रत्येक छात्र अपने साथियों के साथ कैसे फिट होगा। इससे प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की दृष्टि से एकता होती है।