भोपाल: राज्य सरकार ने लम्बे समय से पुलिस द्वारा प्रशासित तीन विशेष कानूनों को निरस्त न करने का निर्णय लिया है। इनमें डकैती व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम 1981 के बारे में तर्क दिया गया है कि प्रदेश में डकैती की समस्या को नियंत्रण में लाने हेतु इस अधिनियम के प्रावधान बहुत प्रभावी सिद्ध हुए हैं। प्रदेश की सीमावर्ती राज्यों से उनके डकैत गैंग एवं पशु चोरी में लिप्त डकैत गैंगों का मूवमेंट बना रहता है, जिनके विरुद्ध सतत कार्यवाही करते रहने की आवश्यकता रहती है।
सीमावर्ती राज्यों के डकैत गैंगों द्वारा प्रदेश के कुछ जिलों में अस्थाई रूप से आश्रयदाताओं एवं सहयोगियों को तैयार किया जाता है, जिन पर नियंत्रण की आवश्यकता रहती है। डकैती प्रभावित जिलों के दुर्गम एवं वन क्षेत्रों में पत्थर की खदानें संचालित रहती हैं, जिनसे जुड़े व्यवसायियों के साथ डकैतों द्वारा वारदात का प्रयास करने की संभावना रहती है।
प्रदेश के सीमावर्ती भाग की भौगोलिक परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए एवं क्षेत्र के असूचीबद्ध डकैत गिरोहों पर सतत नियंत्रण के लिए यह अधिनियम काफी प्रभावी है। इसके अतिरिक्त प्रदेश अंतर्राज्यीय दस्यु गिरोहों की शरणस्थली न बन सके, इस कारण भी उक्त अधिनियम पूर्णत: प्रासंगिक है। राज्य के सीमांत जिले शिवपुरी, मुरैना, भिंड, दतिया एवं राजस्थान के धौलापुरा से स्थानीय दस्यु गिरोहों की आवाजाही बनी रहती है। इनपर नियंत्रण रखने हेतु मामलों को उक्त अधिनियम के तहत पंजीबद्ध किया जाता है। किसी प्रकार के फर्जी मामले नहीं बनाए जाते हैं।
नक्सल समस्या से संबंधित कानून के बारे में तर्क दिया गया है कि प्रदेश में केंद्र सरकार द्वारा विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम 1967 के अंतर्गत नक्सलियों की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) व इसके अग्र संगठनों को प्रतिबंधित घोषित किया गया है। प्रदेश में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) संगठन के सशस्त्र केडर सक्रिय नहीं हैं।
इन प्रतिबंधित संगठनों के समर्थन में गतिविधियों में शामिल पाए जाने पर इस अधिनियम अथवा मप्र विशेष क्षेत्र सुरक्षा अधिनियम, 2000 के प्रावधानों के अंतर्गत कार्यवाही की जाती है। पुलिस द्वारा वामपंथी उग्रवाद व उनके समर्थकों के विरुद्ध कोई फर्जी मामले नहीं बनाए जा रहे हैं। अत: यह आंतरिक सुरक्षा समस्या को रोकने के लिए एक कारगर एवं प्रासंगिक विधि है। मप्र ऋ णियों का संरक्षण अधिनियम 1937 के बारे में तर्क दिया गया है कि समय-समय पर थानों में ऋणदाताओं द्वारा ऋण से ब्याज की राशि वसूलने के लिए जान से मारने की धमकी देने, भयभीत करने एवं दबाव डालने की रिपोर्ट प्राप्त होती है। जिसके कारण इस अधिनियम के अंतर्गत प्रकरण दर्ज किए जाते हैं। अत: यह अधिनियम पूर्णत: प्रासंगिक है।
डॉ. नवीन आनंद जोशी