जंगल महकमे में टूट रहीं हैं परम्पराएं और पनप रहा प्रशासनिक अराजकता एवं निरंकुशता का माहौल


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स्टोरी हाइलाइट्स

वन विभाग के स्थापना काल से चली आ रही परम्परा तब टूट गई जब चार वरिष्ठ आईएफएस सुपरशीट कर शुभ रंजन सेन को वन बल प्रमुख बना दिया गया। सरकार के निर्णय को कैट में चुनौती दी गई। इसके बाद 25 साल चली आ रही परम्परा तोड़कर एपीसीसीएफ को लघु वनोपज संघ का एमडी बना दिया..!!

भोपाल: जंगल महकमे में परम्पराएं तोड़ने की शुरुआत अशोक वर्णवाल के बतौर एसीएस फारेस्ट रहते हुए हो गई थी। अब आम हो गई है। विभाग में सीनियर मोस्ट को ही वन बल प्रमुख बनाया जाता रहा है, भले ही उसका कार्यकाल एक महीने का ही क्यों न बचा हो। वन विभाग के स्थापना काल से चली आ रही परम्परा तब टूट गई जब चार वरिष्ठ आईएफएस सुपरशीट कर शुभ रंजन सेन को वन बल प्रमुख बना दिया गया। सरकार के निर्णय को कैट में चुनौती दी गई। इसके बाद 25 साल चली आ रही परम्परा तोड़कर एपीसीसीएफ को लघु वनोपज संघ का एमडी बना दिया। प्रशासनिक रूप से अपरिपक्व जूनियर को सीनियर पोस्ट पर आसीन करा दिए जाने से मनोज अग्रवाल जैसे अफसर निरंकुश होने लगे है। 

लघु वनोपज संघ के एमडी का पद पीसीसीएफ स्तर के आईएफएस का है। इस पद पर एपीसीसीएफ कमलिका मोहन्ता को पदस्थ कर पीसीसीएफ रेनू सिंह को वन भवन के गलियारों में कदमताल करने के लिए मजबूर कर दिया। पीसीसीएफ रेनू सिंह केंद्र से प्रतिनियुक्ति से लौटी और 7अप्रैल को ही ज्वाइन दे दी है। तब से आज तक उनकी पोस्टिंग नहीं हुई। अब उन्हें पदस्थ करने और सैलरी के लिए पीसीसीएफ का एक पद स्वीकृत कराना पड़ेगा। 

मंसूबदार अग्रवाल की निरंकुशता

एक कहावत है कि जब राजा कमजोर होता है तो मंसूबदार अपने आपको आजाद घोषित कर देते हैं। जंगल महकमे में ऐसा ही तस्वीर बन रही है। इसी कड़ी में पीसीसीएफ कैम्पा मनोज अग्रवाल का एक पत्र सुर्खियों में है।  ऐसा इसलिए कि जो आदेश पीसीसीएफ अनुसंधान एवं विस्तार (आर एंड डी) अर्चना शुक्ला की ओर से जारी होना चाहिए था, वह आदेश कैपा शाखा के मुखिया मनोज अग्रवाल ने अपने हस्ताक्षर से जारी कर दिया। इस पत्र की कॉपी न तो विभाग के मुखिया को देना उचित नहीं समझा और न ही उसकी कॉपी पीसीसीएफ अनुसंधान विस्तार को देना उचित समझा। यस्थिति तब है, जब तत्कालीन वन बल प्रमुख बीएन अंबाडे ने विभाग की शाखाओं को लेकर साफ-साफ आदेश जारी किए थे। उन्होंने एक परिपत्र जारी कर लिखा था कि कैंपा शाखा का काम राशि मुहैया कराना है। मानीटरिंग और खर्च करने का काम संबंधित शाखाएं करेंगी। अग्रवाल के इस आदेश को विभागीय प्रशासनिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन माना जा रहा है। इस पत्र के जरिए यह साफ हो गया कि मध्यप्रदेश के जंगल महकमे में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है।

जूनियर अधिकारी को हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनाने पर कैट सख्त

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) ने राज्य सरकार और चयन समिति को नोटिस जारी कर कड़े सवाल पूछे। मामला प्रदेश के वन विभाग के सर्वोच्च पद 'हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स'की नियुक्ति से जुड़ा है जिसमें वरिष्ठता की अनदेखी करने के गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए गए हैं। मध्य प्रदेश के सबसे वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी हिदायत उल्ला खान ने इस नियुक्ति को चुनौती देते हुए न्याय की गुहार लगाई है जिसके बाद अब पूरे महकमे में हड़कंप की स्थिति बनी हुई है। याचिका में साफ तौर पर यह उल्लेख किया गया है कि हिदायत उल्ला खान 1989 बैच के अधिकारी हैं और वरिष्ठता सूची में पहले स्थान पर होने के बावजूद प्रशासन ने जानबूझकर उन्हें नजरअंदाज किया. हैरानी की बात यह है कि उनसे दो साल जूनियर 1991 बैच के अधिकारी शुभ रंजन सेन को इस महत्वपूर्ण पद की कमान सौंप दी गई है जो वरिष्ठता क्रम में काफी नीचे यानी पांचवें नंबर पर आते हैं।

सोमवार को जबलपुर स्थित अधिकरण में हुई इस मामले की प्रारंभिक सुनवाई ने न केवल वन विभाग बल्कि पूरी राज्य प्रशासनिक चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और नियमावली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अधिवक्ता ने दलील दी कि यह नियुक्ति प्रक्रिया अप्रैल 2009 में केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई उन अनिवार्य गाइडलाइंस का सीधा उल्लंघन है जो उच्च पदों पर पदोन्नति और नियुक्ति के लिए स्पष्ट मापदंड निर्धारित करती हैं। याचिका में यह गंभीर आरोप भी लगाया गया है कि इस महत्वपूर्ण पद पर जूनियर अधिकारी को आसीन करने के पीछे कुछ विशिष्ट 'बाहरी कारण' और अदृश्य राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव काम कर रहे थे जिसकी निष्पक्ष जांच होना बेहद जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसी विसंगतियों को रोका जा सके। जबलपुर स्थित कैट की यह सुनवाई तय करेगी कि आने वाले समय में मध्य प्रदेश में नौकरशाही के सर्वोच्च पदों पर नियुक्तियां नियमों के आधार पर होंगी या फिर व्यक्तिगत पसंद का बोलबाला रहेगा।

पहली बार रिवर्ट होंगे नवागत प्रमोटी आईएफएस

वन विभाग के इतिहास में ऐसा भी पहली बार होगा कि प्रभारी डीएफओ को रिवर्ट करने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। ऐसा इसलिए हुआ कि तत्कालीन एसीएस अशोक वर्णवाल और वीएन अम्बाड़े ने जानबूझकर दागियों के नाम आईएफएस के लिए प्रस्तावित किया था। अब छह महीने बाद भारत सरकार ने राज्य वन सेवा के 20 अधिकारियों को भारतीय वन सेवा के मप्र कैडर में आवंटित किया। इनमें राज्य वन सेवा के तीन दागी अधिकारियों के नाम नोटिफिकेशन लिस्ट से आउट कर दिया है। जबकि राज्य शासन ने आधी-अधूरी जानकारी देखकर आईएफएस के लिए सिफारिश की थी। यही नहीं, बल्कि उनकी प्रभारी डीएफओ के रूप में पोस्टिंग कर दी है।

भारत सरकार ने गुरुवार का जारी आदेश प्रदेश राज्य वन सेवा के '20 (बीस)' अधिकारियों को चयन समिति द्वारा 9 अक्टूबर 25 को आयोजित बैठक में 2023 और 2024 की चयन सूचियों में उनके नाम शामिल किए जाने के आधार पर तत्काल प्रभाव से भारतीय वन सेवा में प्रदेश कैडर में आवंटित किया है। इसमें बालाघाट में हुए टाइगर को जलाने और तथ्य छिपाने के मामले में विवादित SDO बीआर सिरसाम, धार में आर्थिक गड़बड़ी करने के मामले लिप्त संतोष कुमार रन्सोरे और छिपीखपा कटाई कांड में शामिल मान सिंह मरावी IFS नहीं बन पाए। इन तीनों अधिकारियों के खिलाफ समय-समय खबरें प्रकाशित होती रही है। गंभीरजनक पहलू यह है कि वन विभाग के शीर्ष नेतृत्व ने सिरसाम, रनसोरे और मरावी के मामले में तथ्यों को छुपाते हुए उन्हें आईएफएस बनाने के लिए प्रस्तावित किया था।