शक्तिपात दीक्षा विशिष्ट दीक्षा है जिसे देने के लिए गुरु को खुद शक्ति संपन्न बनना होता है| संपन्न गुरु के शक्तिपात से जागृत हुई कुंडलिनी साधक को योग मार्ग से मोक्ष तक की यात्रा कराती  है|

 

जागृत कुंडलिनी के प्रभाव से साधक में अष्टांग योग अपने आप घटित होता हैसाधक को उसकी योग्यता को बढ़ाने के लिए स्वयं अनेक प्रकार के योगासन, बंध, मुद्रा, प्राणायाम, ध्यान, धारणा  होने लगते हैं|

 

कई बार साधक को उसके प्रारब्ध के साधन के कारण अनायास ही शक्तिपात हो जाता हैकई बार उसे उसकी साधना के परिणाम स्वरुप समर्थ सद्गुरू मिलते हैं जो उसकी आंतरिक शक्ति को जागृत कर देते हैं|

 

सबके अंदर कुंडलिनी शक्ति उसके आधार क्षेत्र में मौजूद होती हैसामान्य मनुष्य में वह कुंडलिनी सुप्त अवस्था में होती है लेकिन जब साधक शक्तिपात प्राप्त करता है तो उसकी कुंडलिनी क्रियाशील हो जाती है|