दर्शकों बंगाल की खाड़ी के किनारे हिंदुओं के 4 महान धामों में से एक जगन्नाथ पुरी स्थित है। पुराणों में इसे प्रथ्वी का बैकुंठ कहा गया है। यहां लक्ष्मीपति विष्णु ने तरह-तरह की लीलाएं की थीं। ये भगवान विष्णु के चार धामों में से एक है। उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से 70 किलोमीटर और कटक से 90 किलोमीटर दूर स्थित जगन्नाथ पुरी को श्री क्षेत्र, श्री पुरुषोत्तम क्षेत्र, शाक क्षेत्र, नीलांचल, नीलगिरि भी कहा जाता है।
पुराणों में भगवान जगन्नाथ जी की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है
भगवान जगन्नाथ जी का मंदिर भगवान श्री कृष्ण का हृदय है। यहां भगवान
विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतरित हुए और सबर जनजाति के परम पूज्य देवता बन गए।
सतयुग से लेकर कलयुग तक भगवान हरि विष्णु अलग-अलग रूपों में जगन्नाथ जी में शोभित रहे हैं। मार्कण्डेय मुनि प्रलय के दौरान दौरान समुद्र में
बहते हुए पुरुषोत्तम क्षेत्र में आए थे। यहां उन्हें वट वृक्ष के ऊपर बाल चतुर्भुज रूप में भगवान के दर्शन हुए।
यह स्थान प्रभु श्री हरी के साथ माता सती के लिये भी जाना जाता है, यहाँ
52 पीठों में से एक पीठ है जहाँ माता सती के दोनों पैर भी गिरे थे। त्रेतायुग में यहां शत्रुघ्न जी आए थे, द्वापर युग में वनवास के दौरान पांडवों ने महावेदी के दर्शन किए थे। चैतन्य महाप्रभु यहां रहे थे और यहीं शरीर छोड़ा, जगतगुरु शंकराचार्य ने यहां गोवर्धन मठ की स्थापना की थी।
अब आपको बताते हैं कब और कैसे बना था जगन्नाथ मंदिर?
जगन्नाथ मंदिर का इतिहास ईसा पूर्व का है| इतिहासकारों के मुताबिक ईसा
से 200 साल पहले इस मंदिर का निर्माण किया गया था। इंद्रद्युम्न एक राजा
था, जो मालवा प्रदेश में राज्य करता था। उसे सपने में भगवान जगन्नाथ ने
दर्शन देकर बताया कि भगवान की मूर्ति की स्थापना करो। तब उसने कड़ी
तपस्या की और तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये और वहाँ एक दारु लकड़ी का लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये।
राजा ने ऐसा ही किया और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया। तब विश्वकर्मा
बढ़ई कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए और शर्त
रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे,परन्तु तब तक वह एक कमरे
में बंद रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये। जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी तो उत्सुकता वश राजा ने माह के अंतिम दिन कमरे में झांकता और उसी समय वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आता है और राजा से कहता है कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे।
राजा को अपनी करनी पर अफसोस होता है, राजा के अफसोस करने पर मूर्तिकार कहता है कि यह सब दैववश हुआ है और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगीं। तब से वो ही तीनों मूर्तियां जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों के रूप में मंदिर में स्थापित की गयीं।
कैसा रहा मंदिर का इतिहास?
इस मंदिर का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। छठवीं शताब्दी में
शक-हूणों के एक सेनापति रक्तबाहू ने पुरी पर आक्रमण किया। सातवीं शताब्दी में सूर्यवंशी राजा ययात केसरी ने मंदिर का पुनरुद्धार किया। 1184 में जगन्नाथ जी के मंदिर का फिर जीर्णोद्धार किया गया। 12 वीं शताब्दी में
फिरोज शाह ने इस मंदिर की अनेक मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया।
1567 में बंगाल के नवाब के सेनापति कालापहाड़ ने जगन्नाथ जी के ग्रहों को
जलाने की कोशिश की।1577 में अकबर के सेनापति मानसिंह की पत्नी गौरी देवी ने मंदिर में मुक्त मंडप सहित कुछ निर्माण कार्य कराए। 1609 में कटक के
सूबेदार मकरम खां ने पुरी पर आक्रमण किया। 1610 में एक मुगल सूबेदार ने
रथ यात्रा के समय पुरी पर फिर आक्रमण किया और रथों को जला दिया।1697 में औरंगजेब के निर्देश पर अकरम खां ने मंदिर में तोड़फोड़ और लूटपाट की। 1713 में शुजाउद्दीन ने मंदिर पर आक्रमण किया। 1733 में तकी खां ने जगन्नाथ मंदिर पर आक्रमण किया।
1785 और 1802 में दिव्य सिंह देव द्वितीय ने मंदिर की गरिमा बढ़ाने के
लिए कई कार्य शुरू किए, झूलन यात्रा आरंभ की गई।1803 में अंग्रेजों ने इस
मंदिर पर अधिकार कर लिया।1859 में रानी सूर्यमणि ने मंदिर की व्यवस्था
अपने हाथों में ली। फिर आजादी के बाद 1952 में उड़ीसा सरकार ने जगन्नाथ
मंदिर के लिए कानून बनाया और एक कमेटी बनाई गई।
आइये अब आपको मंदिर की भव्यता के बारे बताते हैं।
जगन्नाथ मंदिर अपने आप में अद्भुत है मंदिर की बाहरी दीवार 20 फीट ऊंची और 665 फीट लंबी है मंदिर के गर्भगृह में रत्न सिंहासन स्थापित है जो 16 फीट लंबा, 13 फीट चौड़ा और 4 फीट ऊंचा है। जगन्नाथ मंदिर में दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर स्थापित है जहाँ 700 चूल्हे बने हैं जिसमें 700 रसोइये महाप्रसाद बनाते हैं, रसोईघर में किसी बाहरी व्यक्ति को प्रवेश की अनुमति नहीं होती है। मंदिर के पुजारी पंडित, सेवक और दूसरे देशों से यात्रियों को ले जाने वाले गुमास्ते सब मिलाकर यहां 6000 से अधिक पुरुष स्त्री और युवा कार्यरत हैं|