पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान कुछ नेताओं की डिमांड बहुत रही साहब तो कुछ नेता ऐसे भी रहे, जिन्हें उनकी पार्टी ने पूछा तक नही। सियासत का लंबा अनुभव रखने के बावजूद हाशिए पर पड़े टीव्ही पर ही चुनावी गतिविधियां देखते रहे।

बेशक हर चुनाव महत्वपूर्ण होता है लेकिन इन पांच राज्यों के चुनाव सियासी दलों के भविष्य का रास्ता तय करने वाले थे। लिहाजा सियासी दलों ने जीत के लिए सारे दांव खेले। अपने हर उस हथियार का उपयोग किया जो जीत की राह तक सके।

उठते पड़ते समीकरणों के बीच शिव बाबू की बड़ी पूछ परख रही। अपनी सरल, सहज एवं बेहतर छबि के चलते चुनावी राज्यों में काफी मांग रही। उत्तराखंड,उत्तरप्रदेश में पार्टी ने शिवराज का जमकर उपयोग किया।

शिव बाबू की रैलियों में भीड़ भी दिखी।

मप्र के मुख्यमंत्री ने अपने अलहदा अंदाज में माहौल भी खूब खींचा। यहाँ शिव बाबू चुनावी कार्यक्रम में व्यस्त थे तो वहां विपक्षी दल कॉंग्रेस के दो बड़े नाम अपने अपने घरों में सिमटे रहे। 9 बार सांसद,कई दफा केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री की भूमिका निभाने वाले कमलबाबू को कांग्रेस ने कोई जिम्मेदारी नही दी यहां तक कि चुनाव प्रचार तक में नही बुलाया। वहीं अपने आप में खलीफा पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह को भी साइड लाइन रखा गया। दिग्गी उत्तराखंड के अलावा कही नही दिखे।

ज़ाहिर है कि जहां कांग्रेस ने मप्र के अपने नेताओं को चुका हुआ सा साबित किया है तो अन्य राज्यों में डिमांड के चलते शिवराज का कद और बड़ा हुआ है। अब इसमें कोई शक नही कि मप्र की सियासत में शिवबाबू की पकड़ और मजबूत होगी