भोपाल: माह फरवरी 2026 में वन विभाग की स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स एवं स्थानीय अमले के द्वारा वन्यजीवों की तस्करी करने वालों के विरुध्द की गई कार्यवाही में 313 जीवित कछुये जब्त किये गये हैं तथा कई लोगों को गिरफ्तार करते हुए इसमे एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश भी किया है। इसके तहत अब वन विभाग ने एडवाइजरी की है जिसमें कहा गया है कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के अनुसार अनुसूचीबद्ध वन्यजीवों का शिकार, व्यापार, खरीद-फरोख्त, परिवहन, कब्जा एवं पालन दंडनीय अपराध है। ऐसी घटनाये एवं शिकायतें प्रकाश में आ रही हैं कि बाजार में पेट शॉप एवं एक्वेरियम की दुकानों पर अवैध रूप से प्रतिबंधित वन्यजीव कछुए, पक्षी, जीवित प्राणी प्रजाति आदि की बिक्री की जा रही है जो पूर्णत: गैर कानूनी है एवं वन्यजीवों की प्राकृतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध है। इस हेतु वन विभाग ने दुकानदारों, पालतू पशु-पक्षी विक्रेताओं हेतु निर्देश जारी कर कहा है कि किसी भी प्रतिबंधित/अनुसूचीबद्ध जीवित वन्यजीव, पक्षी या उनके अंग उत्पाद का क्रय-विक्रय पूर्णत: प्रतिबंधित है।
बिना सक्षम प्राधिकारी (वन विभाग) की वैध अनुमति/लाइसेंस के ऐसी प्रजाति के वन्यजीव का व्यापार न करें। दुकान/संस्थान में उपलब्ध सभी पशु-पक्षियों के वैध स्रोत एवं दस्तावेज सुरक्षित रखें। प्रतिबंधित प्रजाति के वन्यजीवों का सोशल मीडिया, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या अन्य माध्यम से अवैध बिक्री/प्रचार न करें। अवैध वन्यजीव व्यापार की सूचना तत्काल निकटतम वन विभाग कार्यालय/पुलिस थाने या वन विभाग के कॉल सेंटर नंबर- 0755-2524000 पर सूचित करें। इसके अलावा, वन विभाग ने आम नागरिकों/पशु-पक्षी पालन करने वाले व्यक्तियों हेतु निर्देश जारी कर कहा है कि प्रतिबंधित वन्यजीव पक्षियों को घर में पालना, खरीदना या बेचना कानूनन अपराध है। यदि किसी व्यक्ति के पास कोई प्रतिबंधित वन्यजीव है, तो तत्काल निकटतम वन विभाग पुलिस कार्यालय में सूचित करें। विदेशी प्रजाति के जीव जंतुओं को पालते समय कानून में वर्णित प्रक्रिया नियम तथा विभाग द्वारा जारी विशेष निर्देशों का पालन करें। अन्धविश्वास के चलते न तो किसी वन्यजीव को अपने पास रखे और न ही उनका /उनके अंगों/अवयवों का किसी भी प्रकार से उपयोग करें।
इन निर्देशों का उल्बंधन किये जाने पर सम्बन्धित के विरुद्ध वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम-1972 की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत वैधानिक कार्यवाही की जावेगी, जिसमें 7 वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माने का प्रावधान है। सभी वनमंडलाधिकारी (क्षेत्रीय वन्यजीव) एवं वन विकास निगम के सभी संभागीय प्रबंधकों से कहा गया है कि वे अपने-अपने कार्यक्षेत्र में संबंधितों के साथ बैठक आयोजित कर इस संबंध में जागरुकता फैलायें।
डॉ. नवीन आनंद जोशी