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चुनाव आयोग और ये व्यवस्था के प्रश्न ?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Fri , 19 May

सार

सवाल देश की व्यस्था पर है, 75 साल बाद भी देश पारदर्शी चुनाव व्यवस्था क्यों नहीं बना सका ? देश के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया वैसे भी सवालों की जद में है..!

janmat

विस्तार

० प्रतिदिन विचार-राकेश  दुबे

25/11/2022

देश की व्यवस्था अजीब है,हर चुनाव के बाद ई वी एम पर सवाल खड़े होते  रहे हैं, अब देश के चुनाव आयुक्त पर ही सवाल उठने लगे हैं | देश के सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्त के तौर पर अरुण गोयल की नियुक्ति के लिए अपनायी प्रक्रिया पर सवाल ही नहीं  उठाया बल्कि यह तक कहा कि उनकी फाइल को ‘जल्दबाजी' में मंजूरी दी गयी। सुप्रीम कोर्ट अदालत ने यहाँ  कहा कि गोयल की नियुक्ति से जुड़ी फाइल को ‘बहुत तेजी से' क्लियर किया गया।इस पर केंद्र सरकार ने अटॉर्नी जनरल के जरिए कोर्ट से ‘थोड़ा रुकने' के लिए कहा तथा मामले पर विस्तारपूर्वक गौर करने का अनुरोध किया। सवाल देश की व्यस्था पर है, 75 साल बाद भी देश पारदर्शी चुनाव व्यवस्था क्यों  नहीं बना सका ? देश के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया वैसे भी सवालों की जद में है |

सुप्रीम कोर्ट ने इसी सप्ताह ध्यान दिलाया  था कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के कार्यकाल की कम अवधि का बुरा असर चुनाव सुधारों पर पड़ रहा है और इससे आयोग की स्वतंत्रता भी प्रभावित हुई है। तथ्य खुद पूरी स्थिति स्पष्ट कर देते हैं। 1950  से लेकर 1996  तक शुरुआती 46 वर्षों में देश में 10  निर्वाचन आयुक्त हुए। इनका औसत कार्यकाल करीब साढ़े चार साल का निकलता है। इसके बाद के 26  वर्षों में 10 चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए हैं। इनका औसत कार्यकाल करीब ढाई साल बनता है। इन दोनों अवधियों को जो चीज अलग करती है वह है मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में टी एन शेषन का बहुचर्चित कार्यकाल है ।

देखा जाए तो देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में चुनाव आयोग कितनी अहम भूमिका निभाता है यह बात शेषन के कार्यकाल में रेखांकित हुई । आश्चर्य नहीं कि छह साल का संविधान द्वारा तय कार्यकाल पूरा करने वाले वह आखिरी चुनाव आयुक्त साबित हुए। हालांकि संवैधानिक व्यवस्था अब भी यही है कि मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति के दिन से छह वर्ष की अवधि या 65  साल की उम्र होने तक (जो भी पहले हो) अपने पद पर रहेंगे। चूंकि ज्यादातर चुनाव आयुक्त नौकरशाह ही रहे हैं, इसलिए उनके रिटायरमेंट की उम्र पहले से पता होती है। जाहिर है कोई सरकार इसे स्वीकार करे या न करे, चयन ही इस तरह से होता रहा है कि किसी को भी इस पद पर ज्यादा समय न मिले। नतीजतन, किसी भी चुनाव आयुक्त  को अपने विजन को कार्यान्वित करने का मौका नहीं  मिल पाता है ।

इस बार तो 1985 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी गोयल ने एक ही दिन में सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली, एक ही दिन में कानून मंत्रालय ने उनकी फाइल क्लियर कर दी, चार नामों की सूची प्रधानमंत्री के समक्ष पेश की गयी तथा गोयल के नाम को 24 घंटे के भीतर राष्ट्रपति से मंजूरी मिल गयी। इतनी तेज गति पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल दागे हैं|

चूंकि संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया तय नहीं की गई है और यह काम संसद पर छोड़ा गया है, ऐसे में तमाम सरकारें संविधान की इस चुप्पी का फायदा उठाती रहीं। फायदा उठाने की बात इसलिए भी थोड़े विश्वास के साथ कही जा सकती है, क्योंकि ऐसा नहीं है कि सरकार के सामने इसे तय करने की कोई बात आई ही न हो।

आंतरिक प्रस्तावों, सुझावों को छोड़ दें तो भी लॉ कमीशन की अपनी रिपोर्ट में कह चुका है कि मुख्य चुनाव आयुक्त समेत सभी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिशों के आधार पर होनी चाहिए, जिसमें प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष (या लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता) के अलावा देश के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हों।

बावजूद इसके सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के सख्त रवैये के बाद अब उम्मीद की जानी चाहिए कि यह मामला अपनी तार्किक परिणति तक पहुंचेगा। आखिर, भारत जीवंत और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसे चुनाव सुधारों के जरिये और मजबूत किया जाना चाहिए।