इसमें प्रेम, जादुई तिलिस्म और अय्यारों के रोमांच की कहानी है. इसमें राजकुमारी और राजकुमार हैं तो धूर्त दरबारी क्रूर सिंह भी है. राज्यसभा कई नेता जाना चाहते थे, लेकिन राहुल गांधी ने मीनाक्षी की उम्मीदवारी का प्रेम दिखाया तो दूसरे दावेदार नेता क्रूर सिंह की भूमिका में आ गए. पूरा सीरियल ऐसा खेला गया कि सभी खलनायक की भूमिका में थे लेकिन कोई भी खलनायक दिखाई नहीं पड़ रहा था.
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन जिस केस को छिपाने के लिए रद्द हुआ है. उसकी जानकारी न केवल उनको थी बल्कि कांग्रेस की लीगल टीम और जिम्मेदार नेताओं को भी थी. अगर केस का डिस्क्लोजर शपथ पत्र में कर दिया जाता तो क्या नुकसान होता? इसको नहीं करने की लीगल ओपिनियन जहां से भी आई वह साजिश थी या अज्ञानता? यह कांग्रेस कभी नहीं पता कर पाएगी. जब मीनाक्षी नटराजन के एफिडेविट में आपराधिक केस छिपाने की शिकायत रिटर्निंग ऑफिसर के पास दर्ज कराई गई. तब भी कांग्रेस की लीगल टीम और जिम्मेदार नेताओं ने उसे सुधारने का प्रयास नहीं किया बल्कि इस पर अड़े रहे कि इस केस को डिक्लेअर करने की आवश्यकता ही नहीं है. अभी भी कांग्रेस के लीगल एक्सपर्ट और पूरी पार्टी इसी स्टैंड पर कायम है.
तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार है. वहां के पीसीसी प्रेसिडेंट भी नामांकन भरवाने भोपाल आए थे. जो शिकायत कोर्ट में विचाराधीन है, वह भी कांग्रेस की ही एक महिला कार्यकर्ता ने ही दायर की है. जब कांग्रेस को यह पता लग गया कि ऐसी शिकायत आ गई है तो फिर दिन भर में तेलंगाना की कांग्रेस सरकार में इस केस का निराकरण क्यों नहीं किया?
झारखंड में निर्दलीय प्रत्याशी पर कांग्रेस की आपत्ति रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा खारिज किए जाने को भी इस केस से जोड़कर कांग्रेस चुनाव आयोग पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगा रही है. उस केस में प्रत्याशी ने रिटर्निग ऑफिसर से संशोधन का अनुरोध किया. जिसे स्वीकार किया गया. मीनाक्षी नटराजन के केस में सुधार की जरूरत ही नहीं समझी गई. कांग्रेस तो यही मानती रही कि इसकी आवश्यकता ही नहीं है. रिटर्निंग ऑफिसर जो आवश्यक मान रहा है वह कांग्रेस अनावश्यक मानती रही. अब नामांकन रद्द हो गया है तो दो लीगल ओपिनियन में अंतिम लीगैलिटी सुप्रीम कोर्ट में ही तय होगी.
मीनाक्षी नटराजन सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई हैं. नामांकन वापसी के पहले तो सुनवाई नहीं हो पाई. जब तक कोर्ट में सुनवाई होगी तब तक नामांकन वापसी के बाद मध्यप्रदेश के तीनों राज्यसभा प्रत्याशियों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया जाएगा. निर्वाचन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद चुनाव याचिका का रास्ता कांग्रेस के सामने रहेगा.
जब से मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया गया था तभी से विरोध की आवाज़ उठ रही थी. कांग्रेस के विधानसभा के प्रत्याशी रहे एक उम्मीदवार में तो गलत प्रत्याशी उतारने का आरोप लगाते हुए पार्टी भी छोड़ी है. राज्यसभा सीट तो कांग्रेस ने खुद गंवाई है. अब इसके खिलाफ भोपाल और दिल्ली में निर्वाचन आयोग के सामने विधायकों और नेताओं का प्रदर्शन केवल राजनीतिक लोकनृत्य के अलावा कुछ भी नहीं है. यह भी एक तरह का चंद्रकांता सीरियल जैसा है.
हर जिम्मेदार नेता अपनी नाकामी छिपाना चाहता है, नामांकन के लिए जो सिस्टम जिम्मेदार है उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई होना चाहिए लेकिन हर नेता अब राहुल गांधी को यह दिखाने में लगा है कि वह लोकतंत्र के हत्यारे चुनाव आयोग और गोडसेवादी विचारधारा बीजेपी से लड़ रहा है. राष्ट्रपति से भी विधायकों के मिलने की योजना बनाई जा रही है.
एक तरफ कांग्रेस प्रत्याशी के नामांकन के विरुद्ध शिकायत की सुनवाई हो रही है दूसरी तरफ कांग्रेस अपने विधायकों को बेंगलुरु भेजने के लिए विशेष विमान की व्यवस्था कर रही है. विधायक एयरपोर्ट पहुंचते हैं चार-पांच घंटे इंतजार करते हैं जब विमान रन वे पर पहुंचता है तब नामांकन निरस्त होने की सूचना पहुंचती है और विधायक अपने परिवार सहित नेतृत्व को कोसते हुए वापस आ जाते हैं.
अब जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं उसमें यह तो कहा ही जा रहा है कि पूरा षड्यंत्र कांग्रेस के भीतर रचा गया था. शिकायत की जानकारी कांग्रेस से ही पहुंचाई गई थी. कांग्रेस में ऐसा पहली बार नहीं हुआ. इसके पहले कांग्रेस के नेता राजकुमार पटेल विदिशा लोकसभा चुनाव में अपना B फॉर्म ही टाइम पर जमा नहीं कर पाए थे. कांग्रेस में चंद्रकांता सीरियल का इससे बड़ा नमूना क्या होगा कि पूरी ताकत का उपयोग कर कांग्रेस के जिम्मेदार जिस नेता को टिकट दिलाते हैं वह कांग्रेस छोड़ पर बीजेपी में शामिल हो जाता है. इंदौर में जहा यह घटनाक्रम हुआ वहाँ कांग्रेस का कोई प्रत्याशी नहीं बचता. नामांकन फार्म में गड़बड़ी के कारण कांग्रेस के विधायक मुकेश मल्होत्रा का चुनाव न्यायालय द्वारा रद्द किया गया है. इसमें भी जानकारी छुपाने का ही आरोप है.
कांग्रेस में चंद्रकांता सीरियल जैसे क्रूर सिंह की कमी नहीं है. कांग्रेस नेताओं का एक ही लक्ष्य है कि राहुल गांधी का विश्वास हासिल कर पार्टी में पद और चुनाव का टिकट हासिल करें. राहुल गांधी का प्रेम पाने के लिए हर नेता एक दूसरे के पीछे अय्यार लगाए रखता है. वैसे भी कांग्रेस में इतने तिलस्मी दरवाजे हैं कि उनको पार करना हर किसी के बस की बात नहीं है, जादुई ताकत वाला ही वहां तक पहुंच सकता है.
जानबूझकर योजना बद्ध ढंग से मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के पीछे जिम्मेदार अपनी गलती छुपाने का प्रयास कर रहे हैं. इसके लिए अनावश्यक प्रदर्शन कर रहे हैं
कोई जवाब नहीं देना चाहता कि पार्टी की ओर से डमी कैंडिडेट क्यों नहीं उतारा गया, जब यह सामान्य परंपरा है कि हर पार्टी डमी कैंडिडेट उतारती है और नामांकन की जांच पूरी होने के बाद डमी का नाम वापस कर लिया जाता है. अगर कांग्रेस ने ऐसा किया होता तो कम से कम कांग्रेस राज्यसभा निर्वाचन की प्रक्रिया से बाहर तो नहीं होती.
राज्यसभा की इस खुंदक में विधानसभा 2028 के परिणाम की भी झलक देखी जा सकती है. राहुल गांधी को मध्यप्रदेश के अपने घोड़ों की क्षमता का अंदाजा अब तो लग जाना चाहिए. ये भी बारात के घोड़े ही साबित हो रहे हैं. इन घोड़ों से अगले चुनाव में पार्टी की जीत की आशा राज्यसभा निर्वाचन जैसा ही दुख देगी.