अब तो मजाक में भी किसी दल के टूटने की ख़बर आती है तो वह सच ही लगती है. टीएमसी टूट गई, शिवसेना उद्धव गुट में एक बार फिर बगावत हो गई. टीएमसी का ऑपरेशन पूरा होते ही शिवसेना में टूट की खबरें आने लगी थीं. शिवसेना के ऑपरेशन के बाद अब सपा में टूट की खबरें आने लगी हैं.
दो-तिहाई का खेल चल रहा है. लोकसभा में संवैधानिक संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए और पार्टियों में टूट के लिए भी दो तिहाई सदस्यों की संख्या चाहिए. दोनों दो-तिहाई की जरूरत एक दूसरे से जुड़ी हुई लगती है. कुछ महीने पहले ही महिला आरक्षण और डिलिमिटेशन का बिल गिराने में विपक्ष की एकजुटता बड़ी खबर थी. तो उसमें टूट के कारण इस बिल के पारित होने की अब बड़ी चर्चा है. इस टूट के पीछे बीजेपी है, यह सीधा तो नहीं दिखता लेकिन बिना सत्ता के कहीं भी टूट का पत्ता हिल भी नहीं सकता है.
लोकतंत्र के कथित रक्षक इन बगावतों से चिंतित हैं. खास बात यह है कि यह सारी बगावत इन रक्षकों के भाई-भतीजावाद और पक्षपात के कारण ही हो रही है. जो बोया है उसी को यह दल काट रहे हैं. अब बगावती सांसदों को राजनीतिक अवसरवादी और धोखेबाज बताया जा रहा है. जब इन्हीं सांसदों के साथ रहते हुए जनता के साथ धोखा किया जा रहा था तब इन दलों के आकाओं को दिखाई नहीं पड़ रहा था.
दल-बदल की संवैधानिकता इन्हीं राजनीतिक दलों ने बनाई है जो आज इसको अनैतिक और राजनीतिक अवसरवाद बता रहे हैं. दल-बदल का कानून बनाने में यह सारे दल शामिल थे, जो आज उसी से पीड़ित हो रहे हैं. ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया गया कि जो भी चुनाव चिन्ह पर जीतकर आएगा, अगर उसको छोड़कर किसी दूसरे दल में जाएगा तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी. कोई भी राजनीतिक दल इतना स्पष्ट प्रोविजन जानबूझकर नहीं करना चाहता.
जो आज दल बदल के नाम पर रोना रो रहे हैं, वह सब दल बदल का लाभ लेकर कई बार सत्ता की मलाई खाई है. जब एमएलए-एमपी का धर्म केवल सत्ता रह गई है. जब राजनीतिक दल परिवारों के प्राइवेट फर्म बन गए है. दलों की कोई विचारधारा नहीं है. जब तक सत्ता है, तब तक पूरा गेंग एकजुट रहता है. जैसे ही सत्ता जाती है, गैंग के सारे सदस्य अपने-अपने प्रोटेक्शन के लिए नई सत्ता के दरवाजे तलाशने लगते हैं. अब राजनीति में नैतिकता की बात ही बेमानी है. जब खुद को भुगतना पड़ता है, तो नैतिकता याद आती है और जब खुद वही काम करते हैं, तो सत्ता का लालच दिखता है.
लोकतंत्र में अंतिम जवाबदेही जनता के प्रति है. जब राजनीतिक दल प्राइवेट फर्म के रूप में काम कर रहे हैं, तो फिर उनके प्रति जवाबदेही के लिए समर्पित एमएलए-एमपी भी लोकतंत्र से बेमानी ही कर रहे हैं. निर्वाचित प्रतिनिधियों से अगर पर्टियों के प्राइवेट फर्म के मालिक यह अपेक्षा करते हैं, कि एमएलए-एमपी को उनकी गुलामी में ही जीवन गुजारना चाहिए. तो फिर दल-बदल कानून को संवैधानिक स्वरूप देने की आवश्यकता ही नहीं थी.
दल-बदल कानून आने के पहले तो एक दिन में तीन बार दल बदल लिए जाते थे. पूरी सरकार ही दूसरे दल में शामिल हो जाती थी. यह चर्चा ही बेमानी है, कि कोई एक दल इसके लिए दोषी है. सभी दल दल-बदल के दलदल में फंसे हुए हैं. कोई भी एक राजनीतिक दल यह दावा नहीं कर सकता कि उसने कभी भी दल-बदल का लाभ नहीं उठाया है.
संसदीय व्यवस्था में जो अनैतिकता और बुराई दिखाई पड़ती है वह अचानक नहीं है. लंबे समय से वैसा आचरण किया गया है. कोई राजनीतिक दल उसमें सुधार भी नहीं करना चाहता. टीएमसी और शिवसेना उद्धव गुट के बागी सांसदों ने दो-तिहाई विभाजन के बाद दल-बदल कानून को पार करते हुए अपने विधायी सदनों के स्पीकर को मान्यता के आवेदन दे दिए हैं. जब दो-तिहाई हो गए हैं, तब स्पीकर को भी कोई जल्दी नहीं है. मूल दल को भी वह अवसर दे रहे हैं. बाकायदा न्याय की पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए दिखाया जाएगा. अंतिम निर्णय पहले से सबको पता है.
टीएमसी में ममता बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी को अपना उत्तराधिकारी बनाया. उनका आचरण और व्यवहार पार्टी में विद्रोह का कारण बना. उद्धव ठाकरे अपनी नेतृत्व क्षमता प्रमाणित नहीं कर पाए. उन्होंने जब सरकार बनाने के लिए कांग्रेस के साथ बेमेल तालमेल किया तभीबगावत के बीज पड़ गए थे. शिवसेना हिंदुत्व की विचारधारा पर खड़ी हुई थी. जब कांग्रेस के साथ शिवसेना गई तो उनकी वैचारिक बुनियाद तहस-नहस हो गई. अक्षमता, अयोग्यता और गलत निर्णय कैसे राजनीतिक दलों को बर्बाद कर देता है, इसका उदाहरण टीएमसी और शिवसेना की बर्बादी में देखा जा सकता है.
जिन भी राजनीतिक दलों में बगावत हो रही है, उनमें एक कॉमन फैक्टर यह है कि वह दल परिवार की पार्टी बन गए हैं. समाजवादी पार्टी में भी ऐसे ही हालात हैं. कांग्रेस बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है, लेकिन परिवारवादी फैक्टर वैसा ही काम कर रहा है.
लोकसभा के मानसून सत्र के पहले कितने दलों में बगावत हो जाएगी, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता. गारंटी एक बात की है, कि सरकार महिला आरक्षण और डीलिमिटेशन जैसे संविधान संशोधन के बिल को हर कीमत पर पारित कराएगी.
संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई सांसद तो जुड़ेंगे चाहे दल-बदल से चाहे बहिर्गमन से. दल-बदल लोकतंत्र की वैचारिक प्रक्रिया है. इसको रोकना है तो दल बदल कानून ही समाप्त करना पड़ेगा. राज्यसभा में तो सांसद अपना पद त्यागकर नई संभावनाएं बना रहे हैं.
देश की मजबूती राजनीतिक दलों की मजबूती से ज्यादा जरूरी है. पार्टियां प्राइवेट फर्म जैसा काम करेंगी तो लाभ हानि का गणित देखकर दल-बदल भी होगा. कानून बनते ही तोड़ने के लिए हैं. वही शाश्वत है जिसके लिए सरकारों ने कोई कानून नहीं बनाया.