कांग्रेस आश्वस्त है, कि गठबंधन के क्षेत्रीय दलों को उसकी छत्रछाया में आना ही पड़ेगा. कांग्रेस का दिल तो यही कहता है, कि गठबंधन सहयोगी पराजित हों, उनका जो जनाधार लेकर यह दल बने थे, वह सारा जनाधार फिर से कांग्रेस में वापस आ जाए. यह प्रक्रिया शुरु भी हो गई है. अभी तो कांग्रेस को छोड़कर इंडिया गठबंधन के बाकी सारे दल चुनावी पराजय के दर्द से गुजर रहे हैं. उनकी सियासत के लिए अब गठबंधन के सहारे की जरुरत है. कांग्रेस और राहुल गांधी सहारा देते दिखना तो चाहते हैं, लेकिन उनका असली मकसद अपनी खोई जमीन वापस पाना है.
इंडिया गठबंधन की ममता बनर्जी की चाहत पर दिल्ली में बैठक हुई. इस समय सबसे कमजोर ममता बनर्जी ही दिखाई पड़ रही हैं. सोनिया का कंधा उनकी मजबूरी है. विधायक दल के बाद अब संसदीय दल भी टूट गया. उनकी पूरी पार्टी पिघलती जा रही है. कांग्रेस से तो अब यह भी आवाज उठ रही है, कि ममता बनर्जी कांग्रेस में मर्ज हो जाएं. गठबंधन की बैठक में जो भी साझा रणनीति बनी वह कागजी दिखती है. उसमें कोई सोची-समझी रणनीति नहीं दिखाई पड़ती है.
मल्लिकार्जुन खड्गे बैठक के निष्कर्ष बताते हुए कहते हैं, कि इंडिया अलाइंस एसआईआर और मतदाता सूची में गड़बड़ी पर सीजेआई को पत्र लिखेगा. इस मुद्दे पर इंडिया गठबंधन के राजनीतिक दलों की सुप्रीम हार हो चुकी है. गठबंधन में शामिल सभी प्रमुख दल एसआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए थे. सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है. यह पूरी प्रक्रिया वैधानिक ढंग से की गई है. इस सब के बावजूद अब इंडिया गठबंधन पत्र लिखने की बात कर रहा है. पहले याचिका लगाई, जब याचिका खारिज हो गई तो अब पत्र लिखा जा रहा है. इसका मतलब है कि यह गठबंधन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से असहमत है.
यह एकता भी तात्कालिक है. हार से उपजी हुई है. हार के दर्द ने एक दूसरे के कंधे का सहारा मिला है. अभी भी दिल में गठबंधन को लेकर कोई कन्विक्शन नहीं है. गठबंधन की बैठक का कम्पल्शन दिल्ली के चौक-चौराहों पर दिखाई पड़ रहा था. जिसने भी लगाया हो लेकिन ऐसे होर्डिंग दिल्ली में चिपके हुए थे जिसमें गठबंधन के सहयोगियों द्वारा एकदूसरे पर की गई टिप्पणी दिखाई गई थी. इन पोस्टरों को किसने लगाया. इस पर तो सवाल हो सकते हैं, लेकिन पोस्टर में जो कहा गया है, उनमें कोई तथ्यात्मक गलती हो ऐसा तो नहीं दिखाई पड़ता.
दिल और दिमाग जब एक दिशा में सोचता है तभी किसी मुद्दे पर कन्विक्शन बनता है. बिना कन्विक्शन के विभाजित चिंतन से कोई भी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकतीममता बनर्जी विधानसभा चुनाव नहीं हारी होती तो सोनिया गांधी से गले मिलते उनका चित्र देखने को नहीं मिलता. चुनाव में राहुल गांधी ने जिस तरह से ममता बनर्जी की सरकार पर करप्शन गुंडागर्दी और एक समुदाय के पोलराइजेशन का आरोप लगाया था, वह तथ्यातमक रूप से गलत नहीं था, लेकिन अब वही तथ्य गठबंधन की बैठक में तकलीफ पैदा कर रहे हैं.
सीपीएम की ओर से तो यह सवाल खड़ा किया गया कि केरल के चुनाव में उनकी इंटीग्रिटी और ईमानदारी पर राहुल गांधी द्वारा सवाल खड़े किए गए. यहां तक कहा गया कि उनकी पार्टी बीजेपी के साथ मिली हुई है. तमिलनाडु के लिए इसी तरीके की आवाज समाजवादी पार्टी की तरफ से भी उठाई गई. इंडिया गठबंधन से डीएमके और आम आदमी पार्टी ने दूरी बनाई है, तो इसके लिए भी कांग्रेस की रणनीतियों को ही जिम्मेदार बताया जाता है.
इंडिया गठबंधन के झारखंड में जेएमएम के मुख्यमंत्री हैं. वह अगर इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल नहीं होते हैं, तो इसे उनकी नाराजगी के रूप में ही देखा जाना चाहिए.
उद्धव ठाकरे भी ऑनलाइन जुड़ते हैं, जेएमएम के प्रतिनिधि तो आते हैं लेकिन मुख्यमंत्री उससे दूरी बना लेते हैं. राज्यसभा चुनाव में जिस तरह कांग्रेस ने जेएमएम के साथ व्यवहार किया है. उसके कारण वहां कांग्रेस की राज्यसभा की सीट फंस गई है.
इंडिया गठबंधन विश्वास और मुद्दों के संकट से गुजर रहा है. इस गठबंधन का उपयोग केवल मोदी और एनडीए का विरोध बना है. राहुल गांधी जिस तरह के मुद्दों पर अपनी बात उठाते हैं वह जन भावनाओं से कनेक्ट नहीं होती है. कॉकरोच जनता पार्टी का आक्रोश भी कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के राजनीतिक दलों की कमजोरी को ही एक्सपोज़ करता है.
इंडिया गठबंधन अपनी तैयारी अगले लोकसभा चुनाव के लिए कर रहा है. विधानसभा चुनाव में तो केवल यूपी है. जहां सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन है. लोकसभा चुनाव में हर सीट पर भाजपा के सामने इंडिया गठबंधन का एक ही प्रत्याशी उतरे, इस पर साझा रणनीति कितनी भी बने लेकिन यह कभी भी संभव नहीं हो पाता है. जहां कांग्रेस सीधे भाजपा के साथ कई दशकों से मुकाबला कर रही है, वहां तो कांग्रेस हार का मुंह देख रही है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान गुजरात जैसे राज्यों में मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच होता है, लेकिन वहां कांग्रेस खड़ी नहीं हो पाती है.
अभी तो महिला आरक्षण और डीलिमिटेशन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अगला लोकसभा चुनाव होने की संभावना है. लोकसभा सीटों का गणित और नक्शा बदल जाएगा.
क्षेत्रीय दल तो कमजोर हो ही रहे हैं, कांग्रेस भी बीजेपी से मुकाबले में कमजोर साबित हो रही है.राज्यों में आमने-सामने की लड़ाई और केंद्र में गठबंधन की दुहाई अब तक तो सफल नहीं हुई है.
इंडिया गठबंधन को कंपल्शन मानकर एक साथ बैठने से कुछ नहीं होगा. नीति कार्यक्रम और विचारधारा पर कनविक्शन दिखाना होगा. गवर्नेंस के मॉडल स्थापित करने होंगे. कांग्रेस का मॉडल देश ने देखा और भोगा है उस एहसास को मिटाना इंडिया गठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.