आज से भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा ओडिशा के पुरी में बड़ी धूमधाम से शुरू हुई। यात्रा कोरोना काल में भी चल रही थी, लेकिन कोरोना के चलते रथयात्रा का त्यौहार ज्यादा धूमधाम से नहीं मनाया गया। पुरी में रथयात्रा आज यानी 1 जुलाई से शुरू हुई, जो 12 जुलाई तक चलेगी।
विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा आज से आरंभ || #GNTLiveStream #GNTSpecial #JagannathRathYatra #JagannathRathYatra2022 #Jagannath @VaibhavRjShukla https://t.co/oc1vVrXPIr
— GNTTV (@GoodNewsToday) July 1, 2022
हर साल आषाढ़ महीने के दूसरे दिन रथयात्रा शुरू होती है और यह पुरी के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। जुलूस को देखने के लिए काफी संख्या में लोग आते हैं। कहा जाता है कि एक समाधि के सामने भगवान जगन्नाथ की बारात को रोका जाता है।
#WATCH | The Jagannath Rath Yatra begins in Puri, Odisha with much fanfare. The participation of devotees in the Rath Yatra has been allowed this time after a gap of two years following the COVID pandemic. pic.twitter.com/oODjwSLma0
— ANI (@ANI) July 1, 2022
इसमें सवाल यह है कि भगवान जगन्नाथ की बारात को समाधि के सामने क्यों रोका जाता है और ऐसा करने के पीछे की कहानी क्या है। तो आज हम आपको रथयात्रा के बारे में बता रहे हैं और साथ ही हम आपको बताएंगे कि समाधि के सामने भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को रोकने के पीछे क्या कहानी है।
भगवान का रथ क्यों रुकता है?
कहा जाता है कि इस रथयात्रा के दौरान भगवान का रथ समाधि पर रोका जाता है। ग्रैंड रोड पर इससे मंदिर लगभग 200 मीटर आगे है और रथ के गुजरने पर दाईं ओर एक समाधि है, जहां इसे रोका जाता है। कुछ देर यहीं रुकने के बाद रथ आगे बढ़ता है।
रथयात्रा को समाधि पर क्यों रोका जाता है?
अब हम जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ का रथ यहां क्यों रुका..! इसके पीछे क्या मिथक हैं? जहाँगीर के समय एक सूबेदार का विवाह एक ब्राह्मण विधवा से हुआ था और उसका एक पुत्र था जिसका नाम सालबेग था। हिंदू मां होने के नाते सालबेग ने शुरू से ही भगवान जगन्नाथ पंथ की ओर रुख किया था। सालबेग को भगवान जगन्नाथ से बहुत आस्था थी, लेकिन वे मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकें।
जानकारों के अनुसार, सालबेग भी लंबे समय तक वृंदावन में रहें और रथयात्रा में शामिल होने के लिए ओडिशा जाने पर बीमार पड़ गए। इसके बाद सालबेग ने दिल से भगवान को याद किया और एक बार उन्हें देखने की इच्छा जाहिर की। इससे भगवान जगन्नाथ प्रसन्न हुए और उनका रथ स्वयं सालबेग की कुटिया के सामने रुक गया। वहां सालबेग ने भगवान की पूजा-अर्चना की। सालबेग की पूजा पूरी होने के बाद भगवान जगन्नाथ का रथ आगे बढ़ा। यह परंपरा आज भी जारी है।