शूरवीर जिसके नाम से खौफ खाता था अफगानिस्तान?


Image Credit : twitter

स्टोरी हाइलाइट्स

महान योद्धा को इंदौर ने किया नमन..!

मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती। हर किसी की जुबान पर चढ़े इस गीत की एक चर्चित लाइन है:

रंग हरा हरिसिंह नलवे से, रंग लाल है लाल बहादुर से

रंग बना बसंती भगत सिंह, रंग अमन का वीर जवाहर से

इन पंक्तियों में चार नामों में एक नाम हरिसिंह नलवा का है। इतिहास में हरिसिंह का जिक्र एक ऐसे शूरवीर के रूप में होता है जिसका खौफ अफगानिस्तान तक था।  शेर-ए पंजाब के नाम से प्रसिद्ध महाराजा रणजीत सिंह की सेना के इस योद्धा ने कश्मीर से लेकर काबुल तक सिख साम्राज्य का झंडा फहराया था।

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में इस शूरवीर योद्धा ने हरिपुर जिला बसाया था, यहां के हरिपुर चौक में उनकी प्रतिमा थी। पाकिस्तान सरकार ने कुछ समय पहले उनकी मूर्ति को हटा दिया था। 

हरिसिंह नलवा का यहाँ जिक्र इसलिए क्योंकि हाल ही में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इंदौर में एक ब्रिज को सरदार हरिसिंह नलवा के नाम किया है। यहां उनकी प्रतिमा भी लगाई जा रही है। इस पहल से महान योद्धा की वीरता का संदेश नई पीढ़ियों तक जायेगा।

हरिसिंह महाराजा रणजीत सिंह की फौज के सबसे भरोसेमंद कमांडर थे। उनका जन्म 1791 में पंजाब (अब पाकिस्तान) के गुजरांवाला में हुआ था। हरिसिंह ने कई अफगान योद्धाओं को शिकस्त देकर अफगानों के खैबर दर्रे के रास्ते पंजाब आने के मंसूबों पर पानी फेरा। 19वीं सदी की शुरुआत तक खैबर दर्रा ही विदेशी हमलावरों के लिए भारत आने का एकमात्र रास्ता था। 

इतिहासकारों के मुताबिक़ अफगानी लड़ाकों से पंजाब और दिल्ली को खतरा देख महाराजा रणजीत सिंह ने अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिए दो तरह की सेनाएं बनाईं थीं। इसमें से एक का नेतृत्व हरिसिंह को सौंपा गया था। यह सेना महाराजा रणजीत सिंह की सबसे बड़ी ताकत थी। इस सेना के साथ हरिसिंह ने अफगानियों को कई बार मात दी। 

हरिसिंह ने महज 1807 में जब कसूर (अब पाकिस्तान में)  के युद्ध में अफगानी शासक कुतुबुद्दीन खान को शिकस्त दी तब उनकी उम्र केवल 16 साल थी।   वहीं 1813 में हरिसिंह ने अटॉक के युद्ध में आजिम खान व उसके भाई दोस्त मोहम्मद खान को मात दी। ये दोनों काबुल के महमूद शाह केलिए जंग लड़ रहे थे। सिख साम्राज्य की दुर्रानी पठानों के खिलाफ यह पहली बड़ी जीत थी।

1818 में हरिसिंह के नेतृत्व में पेशावर का युद्ध जीता। हरिसिंह ने 1837 में जमरूद पर कब्जा जमाया। यह स्थान रणनीतिक रूप से अहम था क्योंकि खैबर पास के रास्ते अफगानिस्तान जाने का यही रास्ता था। हरिसिंह ने मुल्तान, हजारा, मानेकड़ा, कश्मीर आदि युद्धों में अफगानों की शिकस्त देकर सिख साम्राज्य की सीमाओं को विस्तार दिया। एक के बाद एक लगातार कई जीतों के कारण अफगानों के मन में  हरिसिंह को लेकर दहशत बैठ गई थी। इतिहासकारों के मुताबिक हरी सिंह नलवा ने पेशावर समेत अन्य युद्ध न जीते होते तो पंजाब और दिल्ली में अफगानों की घुसपैठ कभी नहीं रोकी जा सकती थी। 

अप्रैल 1837 में जमरूद में हरि सिंह की मृत्यु हो गई थी। उनकी समाधि लाहौर में बनवाई गई, जो आज भी वहां क़ायम है। हरिसिंह की बहादुरी को सम्मान देते हुए 2013 में भारत सरकार ने उनके ऊपर एक डाक टिकट जारी किया था। भारत के इस पराक्रमी की प्रतिमा पाकिस्तान में भी लगी थी जिसे बीते साल तोड़ दिया गया था जिसका काफी विरोध भी हुआ था।