शिवबाबू को जानते हैं न अजीब से सवाल है न साहब ..कि जो व्यक्ति 18 साल से अधिक प्रदेश का मुखिया हो ,उसे भला कौन न जानता होगा| जब आपके कानो में पड़ा शिवराज तो ...आँखों के सामने जो तस्वीर खिंची होगी..बहुत संभव है कि वो एक सहज,सरल,मिलनसार...बोले तो एकदम टेठ देसी इन्सान वाली हो होगी| | सौ टका मामा,भैया वाली पहचान, जो शिवबाबु को नेतानगरी में हटकर मुकाम देती है| वही यूएसपी जिसका विकल्प पार्टी चाहती तो भी तलाश न पाती सब ठीक था| सब समान्य भी था लेकिन सियासी अटकलों ने जैसे ही जोर पकड़ा तो उठापटक वाले रायचंद सक्रीय हो गए| इतने सक्रिय कि मुखिया जी की असल पहचान को ही कुंद करवा डाला| जहाँ स्नेह की बोल टपकते थे वहां उलटा लटकाने से लेकर दफन करने जैसे शब्द उछलने लगे| जिसके नाम के साथ बच्चो के मामा जुड़ता था,वहां बच्चो के स्थान पर ‘बुलडोजर मामा’ गूंजने लगा| वो पहचान जिसने शिव बाबु को जन जन से जोड़ा,वो धुंधली हो चली| बदले अंदाज और तेवर से नफा क्या हुआ वो तो भगवान जाने ...लेकिन उफ्फ, हार्डकोर समर्थक ज़रूर ठंडे पड़ गए| अब भैया सबकी अपनी अपनी यूएसपी| योगी की सख्त छवि है तो कोई शक नहीं है कि जमीनी नेता के तौर पर शिवराज का कोई तोड़ नहीं| भगवान जाने रायचन्दो ने क्या दिमाग पटक दिया| खैर शिवबाबू फिर बेक टू पवेलियन होते दिख रहें हैं| मामा बुलडोजर को परे रख वापिस अपने पुराने अंदाज में लौटे| बच्चो के मामा बनकर आँगनबाडीयों संसाधन सम्पन्न करने को लेकर गोद लेने अभियान का आगाज किया| जन जाग्रति के लिए खुद हाथ ठेला थामकर खोलने जमा करने निकल पड़े| यानी की अपनी मजबूत और कारगार वाली यूएसपी के साथ चलिए मामा समय पर वापिस आ गए|
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''बुलडोज़र मामा'' से क्यों ''आंगनवाडी वाले मामा'' बने शिवराज,
शिवबाबू को जानते हैं न अजीब से सवाल है न साहब ..कि जो व्यक्ति 18 साल से अधिक प्रदेश का मुखिया हो ,उसे भला कौन न जानता होगा| जब आपके कानो में पड़ा शिवराज तो ...आँखों के सामने जो तस्वीर खिंची होगी..बहुत संभव है कि वो एक सहज,सरल,मिलनसार...बोले तो एकदम टेठ देसी इन्सान वाली हो होगी| | सौ टका मामा,भैया वाली पहचान, जो शिवबाबु को नेतानगरी में हटकर मुकाम देती है| वही यूएसपी जिसका विकल्प पार्टी चाहती तो भी तलाश न पाती