सुप्रीम कोर्ट पर सभी धर्म और संप्रदाय का भरोसा है. राजनीतिक दल और सरकारें भी ऐसा ही दावा करती हैं. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर संसद कानून भी बनाती है और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को संसद बदल भी देती है..!!
धर्म जाति संप्रदाय, पक्ष-विपक्ष से ऊपर कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट की बात जब सुनी जाती है तब कानून बनता है, समाज भी बदलता है, रीतियाँ कुरीतियाँ भी टूटती हैं, किसी देश की नागरिक संहिता लोगों का मौलिक अधिकार है. इसमें भेदभाव नहीं किया जा सकता. दुहाई तो सभी सुप्रीम कोर्ट की देते हैं लेकिन उसकी हर बात को मानते नहीं है.
देश में समान नागरिक संहिता (UCC) पर राजनीतिक विवाद तो सर्वविदित हैं. देश में UCC लाना बीजेपी का एजेंडा है तो मुस्लिम समाज इस पर अलग राय रखता है. इस पर वोट बैंक की खाता बही भी चलती है. सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका में शरियत कानून 1937 की कुछ धाराओं को रद्द करने की मांग की गई. याचिका में कहा गया कि इन धाराओं से मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव होता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पर फैसला करना विधायिका संसद का काम है. शरिया कानून की धारा रद्द कर दी गई तो मुस्लिम समुदाय में संपत्ति के बंटवारे को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं बचेगा. इससे कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट कई बार पहले ही कह चुका है कि देश में UCC लाना जरूरी है. अब एक बार फिर इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने यही निर्देश दिया है.
बीजेपी UCC लागू करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता चुनावी घोषणापत्रों में दोहराती रही है. राज्य स्तर पर उत्तराखंड सरकार ने राज्य में समान नागरिक संहिता लागू कर दी है. उनकी दूसरी राज्य सरकारें भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं.
मुस्लिम समाज की जनसंख्या देश में सरकार बनाने और बिगड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. मुस्लिम वोट बैंक के रूप में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के खाते में ही माने जाते हैं. मुस्लिम समाज में प्रगतिशील वर्ग बढ़ रहा है. अरब देशों में बहुत सारे सुधार और बदलाव हो रहे हैं.
इसके विपरीत धार्मिक कट्टरता भी कुछ देशों में देखी जा सकती है. ईरान अमेरिका और इजरायल के बीच युद्ध के पीछे जो भी सामरिक और आर्थिक कारण होंगे लेकिन एक कारण इस्लामिक कट्टरता भी है. भारत के संदर्भ में भले ही कट्टरता की गंभीरता थोड़ी कम हो लेकिन बीज तो दिखता ही है. आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता लेकिन जब आतंकवादी घटनाएं एक ही मजहब से जुड़ती हैं तो फिर इस बात को मानना असंभव लगता है. कश्मीर में आतंकवादी घटनाएं, कश्मीरी पंडितों का पलायन और 370 के बाद आए बदलाव से भरोसा मजबूत होता है कि सुधार की ईमानदार कोशिश और हिम्मत दिखाई जाए तो लोगों का साथ मिलता है,
वक्फ कानून नियमों में संशोधन पर मुस्लिम समाज के साथ ही वोट बैंक के ठेकेदारों ने जितना हल्ला मचाया था वह धीरे-धीरे इसीलिए कमजोर हुआ क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में उस कानून को असंवैधानिक नहीं घोषित किया. वक्त के साथ सुधार अस्तित्व की पुकार है. बीजेपी सरकार द्वारा तीन तलाक खत्म करने को लेकर कानून बनाया गया तब भी धार्मिक कट्टरता के कारण विरोध किया गया लेकिन इसके बाद मुस्लिम महिलाओं जो ताकत मिली है उसी का परिणाम है कि अब UCC को लेकर भी सर्वोच्च अदालत में याचिका लगाई जा रही है.
राष्ट्र में समानता का मौलिक आधार है .ऐसे में भेदभाव समाप्त करने वाले मुद्दों पर राजनीति या धार्मिक विवाद खड़े करना कालांतर में समाज को नुकसान ही पहुंचाता है. धार्मिक कट्टरता अगर समाज की आधी आबादी महिलाओं के हितों को प्रभावित कर रही है,उनके अधिकारों का हनन कर रही है तो फिर कानूनी प्रक्रिया चुपचाप कैसे बैठी रह सकती है?
यह मानना भी सही नहीं लगता कि भाजपा सरकार मुस्लिम महिलाओं के हित में समाज की मान्यताओं पर चोट करती है. अगर ऐसा भी माना जाए तब भी आधी आबादी के साथ समानता और न्याय से तो पीछे नहीं रहा जा सकता.
सुधार की हर प्रकिया का विरोध नकारात्मक मानसिकता है. इस नकारात्मकता के लिए मुस्लिम समाज से ज्यादा राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं. SIR का विरोध, एनआरसी का विरोध, UCC का विरोध, CAA का विरोध, वक्फ कानून का विरोध तो फिर कोई भी सुधार कैसे होगा? घुसपैठियों को देश से बाहर करने का भी विरोध राष्ट्रीय हित तो नहीं हो सकता, इससे राजनीतिक हित भले साधे जा सकते हों.
बीजेपी का ट्रैक रिकॉर्ड गवाह है कि राजनीतिक विरोध के बाद भी सुधार के लिए कदम बढ़ाने से वह हिचकती नहीं है. 370 हटाई गई , अदालत के निर्णय पर राम मंदिर भी बना, NRC भी आया, CAA भी लागू हुआ, वक्फ कानून भी बदला, अब UCC लागू करने की दिशा में बीजेपी की सरकार आगे बढ़ती तो दिखाई पड़ रही है. राज्यों में इसे प्रभावी रूप से लागू करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संसद में कानून बनाना अब तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन में भी आवश्यक हो गया है.
नेशनल इश्यूज पर पर्सनल व्यूज मायने नहीं रखते हैं. सुप्रीम कोर्ट को तो ना पर्सनल बोर्ड इनकार कर सकता है और ना ही सरकार. धार्मिक मान्यताओं के आधार पर दो समुदायों के लिए अलग-अलग कानून और नियम राष्ट्रीयता भावना को कमजोर करते हैं. लोकसभा विधानसभा में नारी शक्ति को रिजर्वेशन देने का भी कानून बीजेपी सरकार ने बनाया है. इसमें हिंदू महिलाओं के साथ मुस्लिम महिलाओं को भी लाभ होगा. अब UCC के मामले में बीजेपी की सरकार को अपना कमिटमेंट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करने तत्परता से आगे आने की आवश्यकता है.
हर मामले में राजनीतिक विरोध हुआ है, इस पर भी होगा लेकिन समाज सुधारकों को उनके दौर में तो विरोध ही झेलना पड़ा है. बाद में ही उनकी पहल को माना और सराहा जाता है.