राज्यसभा चुनाव मध्य प्रदेश में बीजेपी और कांग्रेस की लीडरशिप के लिए चुनौती बन गया है. कांग्रेस अपनी सीट बचाने के लिए विधायकों की बाड़ेबंदी में जुट गई है. तो बीजेपी का राज्य नेतृत्व तीसरे उम्मीदवार को जिताने केंद्रीय नेतृत्व से कमिटमेंट कर दिया है..!!
मौजूदा आंकड़े कांग्रेस के पक्ष में हैं, लेकिन जीतने की उम्मीद बीजेपी कर रही है. कांग्रेस में क्रॉस वोटिंग के बिना यह संभव नहीं है. लोकतांत्रिक दादागिरी का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है, कि संख्या बल न होने के बावजूद क्रास वोटिंग के लिए तीसरा उम्मीदवार उतारा जाता है. इसका कारण भी कांग्रेस में प्रत्याशी चयन में की गई दादागिरी है. क्षेत्रीय क्षत्रपों को दरकिनार करते हुए राहुल गांधी ने अपनी कोर टीम से मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बना दिया. उनका राज्य की राजनीति में बहुत लंबे समय से कोई रोल नहीं रहा है.
दिग्विजय सिंह के रिटायरमेंट से खाली हुई सीट पर कमलनाथ राज्यसभा जाने की तैयारी कर रहे थे. विधायकों के मैनेजमेंट के नाम पर यह डर बताया गया था, कि किसी क्षत्रप को ही राज्यसभा टिकट दिया जाना चाहिए ताकि क्रॉस वोटिंग की संभावना ना हो. राहुल गांधी ने क्षत्रपों को ना केवल नकार दिया बल्कि एक तरह से अपमानित किया है.
जब बीजेपी ने कांग्रेस के भीतर बगावत भांप ली, तब तीसरा प्रत्याशी उतारने का फैसला किया. राज्यसभा चुनाव और क्रॉस वोटिंग एक परंपरा बन गई है. हर राज्य में हर दल में क्रॉस वोटिंग का पूरा उपयोग किया जाता है. कांग्रेस ने भी किया है. राज्यसभा का निर्वाचन ही पावर और पैसे का मैनेजमेंट कहा जा सकता है. बड़े-बड़े उद्योगपति भी इसी दम पर राज्यसभा में जाते हैं. यह तो स्पष्ट है कि बीजेपी का तीसरा प्रत्याशी कांग्रेस में क्रॉस वोटिंग से ही जीतेगा. इसमें ना कोई नैतिकता है और ना ही कोई लोकतांत्रिक मर्यादा की चर्चा है. यह तो केवल जीतने का धर्म युद्ध है.
कांग्रेस हाई कमान ने राज्यसभा प्रत्याशी चयन में तो क्षेत्रीय क्षत्रपों को ना केवल नजरअंदाज किया बल्कि विधायकों के मैनेजमेंट का भी जिम्मा कर्नाटक और तेलंगाना के अपने मुख्यमंत्रियों को सौंप दिया. मीनाक्षी नटराजन तेलंगाना की कांग्रेस की प्रभारी हैं. उनका नामांकन भरवाने के लिए तेलंगाना और कर्नाटक के पीसीसी प्रेसिडेंट भोपाल पहुंचे हैं. इसके पीछे मंतव्य यही है, कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह पर हाईकमान विधायकों को संभालने का भरोसा नहीं कर रही है. अब कांग्रेस अपने विधायकों को बेंगलुरु या हैदराबाद में ले जाकर एक साथ रखने की तैयारी कर रही है. किसी को होटल में रखने से उसकी बगावत नहीं रोकी जा सकती है.
साफ है कि कांग्रेस को अपने विधायकों पर भरोसा नहीं है. कांग्रेस जानती है कि उसके विधायकों में क्रॉस वोटिंग वायरस एक्टिव है. इसके पहले भी कांग्रेस क्रॉस वोटिंग करती रही है. राष्ट्रपति चुनाव में भी क्रॉस वोटिंग की थी. पीसीसी प्रेसिडेंट जीतू पटवारी बीजेपी द्वारा तीसरा प्रत्याशी उतारने पर अपनी प्रतिक्रिया में इसे लोकतंत्र विरोधी बताते हुए कहते हैं कि कांग्रेस का प्रत्याशी हर कीमत पर जीतेगा. परिणाम अप्रत्याशित होगा. उनके इस शब्द से तो यह लगता है कि शायद उनका मन कांग्रेस की जीत पर डोल रहा है.
मध्य प्रदेश की कांग्रेस में बगावत आम बात है. इसी कारण कांग्रेस की सरकार गिरी. कांग्रेस के राज्य नेतृत्व और क्षेत्रीय बुजुर्ग क्षत्रपों के बीच में अंतरदंद्व सार्वजनिक हैं. राज्यसभा की लड़ाई विधानसभा की पिच तैयार कर रही है. कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को हाईकमान कितना भी कमजोर कर दे, लेकिन राज्य में उनके राजनीतिक अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है. इन दोनों नेताओं की अच्छी फॉलोइंग है. पार्टी को जिताने में इनका योगदान भले नहीं आंका जा सकता हो, लेकिन पार्टी को हराने की क्षमता तो इनसे कोई भी छीन नहीं सकता है.
यह राज्यसभा चुनाव अब कांग्रेस की जीत का विषय नहीं बचा है, बल्कि पूरी राजनीति बीजेपी की ओर सिमट गई है. इतिहास यही बताता है कि बीजेपी पुख्ता व्यवस्था के बाद ही ऐसा राजनीतिक कदम बढ़ाती है.
कांग्रेस भी कोई को कसर नहीं छोड़ेगी. अब हालात ऐसे हो गए हैं कि या तो राज्यसभा चुनाव बीजेपी जीतेगी या बीजेपी की स्टेट लीडरशिप अपनी राजनीतिक पकड़ हार जाएगी.
सीएम मोहन यादव छिंदवाड़ा लोकसभा सीट बीजेपी के खाते में डालकर अपनी राजनीतिक उपयोगिता साबित कर चुके हैं. राज्यसभा का चुनाव केंद्रीय नेतृत्व के सामने उनकी राजनीतिक पकड़ साबित करने का यह बड़ा मौका है. यह चैलेंज उन्होंने स्वयं सरकार किया है. अगर बीजेपी का राज्य नेतृत्व पहले ही यह राय व्यक्त कर देता कि तीसरी सीट जीतना पार्टी के लिए नामुमकिन है, तो फिर केंद्रीय नेतृत्व तीसरा प्रत्याशी उतारने के लिए अपनी सहमति ही नहीं देता. अब जब तीसरा प्रत्याशी उतार दिया गया है, तो इसका सीधा मतलब है, कि स्टेट लीडरशिप ने केंद्रीय नेतृत्व को तीसरी सीट जीतने का वायदा किया है.
कांग्रेस विधायकों पर मोहन के सम्मोहन की परीक्षा इस चुनाव में होगी, ऐसा कहा जा रहा है, कि चुनाव के समय बीजेपी के कुछ नेताओं को कांग्रेस पार्टी में लाकर विधायक बना दिया था. ऐसे विधायक बीजेपी से सम्मोहित हैं. सम्मोहन संक्रामक होता है. यह संक्रमण कांग्रेस में क्रॉस वोटिंग की किस सीमा तक जाएगा, यह तो परिणाम बताएंगे.
क्षेत्रीय क्षत्रपों का अपमान भी क्रॉस वोटिंग के घमासान का कारण बन रहा है. बीजेपी तो इसे हवा दे ही रही है. बीजेपी ने खुद ही राजनीतिक चुनौती ली है, तो हारने के लिए तो नहीं ली होगी.