मध्य प्रदेश में भी गाहे-बगाहे ऐसे नारे सुनने को मिल जाते हैं, जब लोग वायदाखिलाफी पर खुलकर खड़े हो जाते हैं, तब जनप्रतिनिधि को ऐसे दौर से गुजरना पड़ता है, जो उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर देता है. भाजपा विधायक ओमप्रकाश सकलेचा ने सड़क बनाने का वादा तो कर लिया लेकिन अब तक कुछ नहीं हो पाया. जब वहां पहुंचते हैं तब उनका विरोध होता है. लोगों ने ना केवल घेरा बल्कि सुरक्षाकर्मियों से हाथापाई भी की गई.

    लोगों का यह आक्रोश तभी फूटा होगा जब यह सड़क उनके लिए लाइफ लाइन जैसी होगी. जनप्रतिनिधि को ऐसी सड़क बनाने में बिलंब करना ही नहीं चाहिए. वैसे मध्य प्रदेश में सड़कों का विकास उल्लेखनीय ढंग से हो रहा है. फिर यह सड़क कैसे रह गई. विधायक की जागरुकता भी क्षेत्र में विकास की गति को प्रोत्साहित करती है. जिस पार्टी की सरकार है, उसी का विधायक अगर अपने क्षेत्र में इस तरह से घेरा जाने लगे तो फिर इसका संदेश गलत जाता है. सड़क, पानी, बिजली जैसी बुनियादी विकास की जरूरत पर तो सबसे पहले ध्यान देने की आवश्यकता है.

    मध्य प्रदेश में दूसरा बड़ा मामला पीसीसी प्रेसिडेंट जीतू पटवारी से जुड़ा हुआ है. पहली बार यह पता चला कि जीतू पटवारी के पास वेयरहाउस है. जिनका उन्होंने सरकार की एजेंसी वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन के साथ एग्रीमेंट किया हुआ है. उनके वेयरहाउस को सरकार से नियमित इनकम होती है. वेयरहाउस में खाद्यान्न रखा हुआ है. सरकार की योजना के तहत यह काम हो रहा होगा. इसलिए इसमें कोई आपत्ति नहीं है. विवाद की शुरुआत तब हुई जब वेयर हाउसिंग कॉरपोरेशन के नए अध्यक्ष संजय नगायच ने इन वेयरहाउसों का निरीक्षण किया. इसके बाद उन्होंने एक ऐसा वीडियो पोस्ट किया जिसमें यह बताया कि जीतू पटवारी के वेयरहाउस में नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है. कॉर्पोरेशन की जो भी आवश्यक शर्तें हैं उनका उल्लंघन हो रहा है. उनका वीडियो सामने आते ही जीतू पटवारी भी वीडियो में जवाब देने लगे.

   जवाबी वीडियो में प्रदेश अध्यक्ष वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन के किसी अफसर से बात कर रहे हैं. उसका बाकायदा वीडियो बनाया गया है. इस बातचीत में वह ऐसा कहते सुने जा रहे हैं, कि वेयरहाउसिंग से कोई नाचन गायन उनके वेयरहाउस पर गए थे. ऐसा नहीं है कि उन्हें संजय नगायच का नाम नहीं मालूम है लेकिन राजनीति में किसी को उसकी हैसियत बताने के लिए ऐसा ही होता है. राजनेता शब्दों से ही खेलते हैं. इसके पहले जीतू पटवारी और सीएम के बीच ऐसे ही शब्दों के बाण चल चुके हैं.

    कई बार तो ऐसा लगता है, कि उग्र शब्दों के जरिए वास्तविकता को छिपाया जाता है. पिछले कुछ दिनों से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष आक्रामक शब्दों में सरकार की आलोचना कर रहे हैं, यहां तक कि सीएम के खिलाफ भी ऐसे शब्दों को उपयोग कर रहे हैं जो संसदीय सीमा पार कर देते हैं. सीएम भी इसका खुलकर जवाब देते हैं. दोनों एक-दूसरे पर हमला कर रहे हैं. प्रदेश के लोग इसको ही देख रहे हैं और इसके एनालिसिस में ही व्यस्त हैं.

    ऐसा जनरल इंप्रेशन बन रहा है कि कांग्रेस के नेता सरकार से पूरी ताकत के साथ लड़ रहे हैं. वास्तविकता अब सामने आई है, कि पीसीसी प्रेसिडेंट जिस सरकार से लड़ाई कर रहे हैं, उसी सरकार से कमाई भी कर रहे हैं. सामान्य रूप से यह गलत नहीं है लेकिन इससे लड़ाई की वास्तविक नियत जरूर समझी जा सकती है. डेमोक्रेसी पक्ष और विपक्ष दो मजबूत स्तंभों पर खड़ी है. अगर दोनों स्तंभ लाभ के धंधे में एक दूसरे के सहयोगी या साथी बन जाते हैं तो फिर लड़ाई कैसे लड़ी जा सकती है? 

    संविधान निर्माताओं ने इसीलिए लोकसभा और विधानसभा के सदस्यों के लिए लाभ के पद की परिकल्पना की थी. संविधान की मंशा है कि कानून बनाने की प्रक्रिया में शामिल लोग निष्पक्षता और बिना किसी लाभ के अपने दायित्वों का निर्वहन करें. सरकार के खिलाफ विपक्ष बयानबाजी तो खूब करता है, लेकिन कोई भी जनांदोलन खड़ा नहीं कर पाता है. इसका कारण शायद यही होता है कि विपक्षी नेताओं का सरकार और उसकी संस्थाओं के साथ लेन-देन होता है. वह लेन-देन भले ही सामान्य लोगों को पता नहीं है, लेकिन जिनका लेन-देन है उनको तो पूरी जानकारी होती है.

    बयानबाजी में लड़ाई सबसे बेहतर परफॉर्मेंस दिखाई पड़ती है. पब्लिक के सामने यह भी मैसेज चला जाता है कि विपक्ष का नेता अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहा है. वास्तव में उनके बयानों का ना सरकार पर और ना ही जनता पर कोई प्रभाव पड़ता है. इसी तरह का ट्रेंड अब लगातार दिखाई पड़ता है. लोकसभा और विधानसभाओं में विपक्षी अपनी बात रखने से ज्यादा परिषर में प्रदर्शन पर यकीन रखते हैं. अप्रत्याशित स्वांग रचे जाते हैं. 

    कब बोलना है, कितना बोलना है यह जिस नेता को नहीं आया वह कभी सक्सेसफुल हो ही नहीं सकता. वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन के अध्यक्ष ने जीतू पटवारी के वेयरहाउस पर जो भी निरीक्षण किया उसका जितना भी प्रचार उनके वीडियो से नहीं हुआ, उससे ज्यादा प्रचार पटवारी ने स्वयं अपना वीडियो डालकर कर दिया है. यह तथ्य तो बना ही रहेगा कि जीतू पटवारी सरकार की एक संस्था के साथ लेन-देन में शामिल हैं. 

    धंधे में सीनाजोरी नहीं चलती. वेयरहाउसिंग भी एक धंधा है. अगर कुछ कमी है तो उसे दुरुस्त करना ही पड़ेगा. सीनाजोरी की कमाई और वायदाखिलाफ़ी की बेहयाई सियासत की सच्चाई बन गई है. 

    सरकार से लड़ाई और सरकार से ही कमाई की रहनुमाई बढ़ते-बढ़ते, चोर-चोर की जग हंसाई बन जाती है.