राम मंदिर ट्रस्ट की गतिविधियों में न केवल पारदर्शिता होनी चाहिए बल्कि उसे दिखना भी चाहिए. सीएम योगी आदित्यनाथ तो राम मंदिर में चोरी करने वालों को किसी कीमत पर माफ नहीं करेंगे. 

    राम मंदिर ट्रस्ट पर चढ़ावे के दान में चोरी का लगा दाग मिटाना जरूरी है. इस पर भ्रम फैलाने में कोई कमी इसलिए नहीं रहेगी क्योंकि जो लोग राम मंदिर आंदोलन को बीजेपी की सफलता की कहानी मानते हैं, वह राम मंदिर के इस घोटाले को अफवाह के रूप में फैलाने में कोई कमी नहीं रखेंगे. यही हो रहा है, जिस कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने राम मंदिर आंदोलन, न्यायालयीन संघर्ष, मंदिर निर्माण, शिलान्यास और प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रमों का विरोध किया वह आज चढ़ावे में चोरी को हिंदू संस्कृति के खिलाफ बता रहे हैं. योगी आदित्यनाथ का बुलडोजर जस्टिस राम मंदिर दान चोरी में भी देखने को मिलेगा यह भरोसा किया जा सकता है.

    अयोध्या सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र की अटूट सत्यनिष्ठा, कर्तव्य परायणता और वचनों के पालन के लिए अमर है. उन्होंने एक कठिन परीक्षा में अपना पूरा राज्य धन और परिवार त्याग दिया. सत्य की रक्षा के लिए वह शमशान के रखवाले बन गए, लेकिन कभी अपने आदर्शों से पीछे नहीं हटे. भगवान राम की मर्यादा भी अयोध्या की विरासत है. जिस अयोध्या में ऐसे प्रतापी राजा हुए जो अपनी सारी धन संपत्ति और वैभव दान कर सकते हैं. उस अयोध्या में राम मंदिर में दान में चोरी करने वाले कैसे संरक्षण पा सकते हैं. 

     चोरी की शिकायत पर एसआईटी जांच कर रही है. सीसीटीवी खंगाले जा रहे हैं. ट्रस्ट के सदस्यों से पूछताछ हो रही है. सेवादारों की संपत्तियां भी खंगाली जा रही हैं. श्रद्धालुओं का यह भरोसा नहीं टूटना चाहिए कि उनके दान का दुरुपयोग हो रहा है.

    हर बुराई में भी एक अच्छाई छिपी होती है. जो दान में चोरी में राजनीतिक लाभ देख रहे हैं, उनको यह तो अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि हिंदुओं में उनकी संस्कृति और आस्था के प्रति प्रतिबद्धता किस सीमा तक पहुंच गई है. हिंदू अपने मंदिरों में दान को प्रमुखता दे रहे हैं

    राम मंदिर निर्माण का क्रेडिट बीजेपी के खाते में गया है. तो चढ़ावे में चोरी का नेरेटिव गढ़कर विरोधी उसकी काट तलाश रहे हैं. मंदिरों में चढ़ावे और दान में छेड़छाड़ कई बार सामने आती है. सेवादार देवभूमि से नहीं आते हैं, वह भी इसी समाज का पार्ट हैं. लालच कब चोरी बन जाए यह किसी के बारे में कल्पना नहीं की जा सकती. कोई अपराध करेगा तो उसे सजा मिलेगी. लेकिन यह ऐसा अपराध है जो अयोध्या की संस्कृति और विरासत को कलंकित कर रहा है. इसलिए सरकार की जवाबदारी ज्यादा हो गई है कि इस पूरे मामले को पूरी गंभीरता से लेकर दोषियों को बेनकाब करे. 

     ट्रस्ट के सदस्यों को भी आजीवन क्यों अवसर मिलना चाहिए. इसमें बदलाव होते रहना चाहिए. इसके साथ ही राम मंदिर का मैनेजमेंट ट्रस्ट के सदस्य नहीं कर सकते हैं, इसकी दिव्यता, भव्यता, विशालता और श्रद्धालुओं की आवक इतनी अधिक है कि अब ट्रस्ट के मैनेजमेंट में सीनियर लेवल के कार्यकारी अधिकारी की पदस्थापना अनिवार्य लग रही है.

    मंदिरों के प्रबंधन को डिस्प्यूट में लाना नया तरीका नहीं है. तिरुपति बालाजी के मंदिर में भी नकली घी के उपयोग का विवाद पैदा किया गया था. अब धार्मिक आस्था अपना राजनीतिक प्रभाव भी दिखाने लगी है. इसलिए वोट बैंक की राजनीति आस्था के भीतर घुसकर तो मुकाबला नहीं कर सकती है, लेकिन उसको बदनाम कर जरूर कुछ हासिल करने का प्रयास कर सकती है. इस केस की सच्चाई सामने आएगी तब पता लगेगा. रुल ऑफ लॉ में ही शिकायत की जांच होगी. अपराधियों को भी उसके अंतर्गत ही सजा मिलेगी.

    हिंदू मंदिरों में दान के मैनेजमेंट पर विवाद लंबे समय से चल रहा है. हिंदुओं की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी विचाराधीन है कि हिंदू मंदिरों का प्रबंधन सरकारों के नियंत्रण में क्यों होना चाहिए? जब धार्मिक स्वतंत्रता प्रत्येक समुदाय और नागरिक के लिए है तो फिर हिंदू मंदिरों के प्रबंधन का अधिकार राज्य सरकारों के पास क्यों रहे? जबकि दूसरे धर्म मुस्लिम, सिख, ईसाई के धर्म स्थलों का प्रबंधन इसी समुदाय के पास है. हिंदुओं के साथ यह दोहरा बर्ताव क्यों हो रहा है? 

    हिंदू मंदिरों का चढ़ावा तो पहले से ही सरकारों द्वारा लूटा जा रहा है. दान हिंदू देते हैं, लेकिन उस राशि का उपयोग सरकार हिंदू संस्कृति के विकास के लिए नहीं करती बल्कि दूसरे धर्म के अनुयायियों के लिए भी इस राशि का उपयोग किया जाता है.

    राम मंदिर की धर्म ध्वजा हिंदुत्व की ध्वजा के रूप में लहरा रही है. इस लहर के लिए हजारों ने बलिदान किया है. कारसेवकों ने अपनी बली दी है. जिन पर कारसेवकों की हत्या का दोष है उन्हें आज दान में चोरी की शिक़ायत राजनीतिक लाभ का सौदा दिखाई पड़ रहा है. जो चेहरे राम मंदिर जाने से इसलिए रुक जाते हैं कि कहीं उनका वोट बैंक नाराज ना हो जाए, उन चेहरों के मुंह से ऐसे आरोपों को विश्वसनीयता नहीं मिल सकती है.

    राम मंदिर में चोरी के लिए जिम्मेदार हर अपराधी को बेनकाब करना हिंदुत्व की आस्था की अडिगता के लिए जरूरी है. हिंदू मंदिरों के प्रबंधन के लिए दूसरे धर्मों की तरह हिंदुओं को ही मौका मिले ऐसा कानून में संशोधन भी समय की जरूरत है. सनातन बोर्ड की मांग इसी का हिस्सा है.

    हिंदुओं में आया होश हर उस जोश को ठंडा कर देगा जो हिंदुत्व को कमजोर करेगा. राम मंदिर जैसा दिव्य है, वैसा ही वहां का प्रबंधन भी पारदर्शी और पवित्र हो, यह सरकार की जिम्मेदारी है.