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चेहरे की इबारत, बता रही घोटाले की महारत

सार

अमीर नेताओं को कांग्रेस की गरीबी चिंतित कर रही है. जो महलों में रहते हैं, लाखों-करोड़ों की गाड़ियों पर चलते हैं, जिनके चेहरे, रहन-सहन से अमीरी टपकती है उन्हें अब कांग्रेस की गरीबी की चिंता हो रही है..!!

janmat

विस्तार

    कांग्रेस तो नेताओं के कारण गरीब है. नेता पार्टी को कहने को तो तन-मन-धन देते रहे लेकिन पार्टी कंगाल होती गई और नेताओं का धन बढ़ता गया. राहुल गांधी भी कह रहे हैं कि कांग्रेस नेता अमीर हैं पार्टी गरीब. पार्टी अमीर नहीं होना चाहती. पार्टी की गरीबी को वे देश के गरीबों की सहयोगी और समर्थक मानते हैं. लखनऊ में काशीराम की जयंती पर राहुल गांधी और दूसरे नेताओं की एक चिंता तो काशीराम को भारत रत्न देने की रही और दूसरी चिंता पार्टी की गरीबी की.

    कांग्रेस अभी विपक्ष में हो लेकिन कभी वह अकेली सत्ता की पार्टी थी. अभी भी कांग्रेस की तीन राज्यों में सरकारें हैं. कांग्रेस में कोई भी स्थापित नेता न गरीब है और न ही गरीब दिखने की कोशिश करता है. कांग्रेस की समस्या यही है कि उसके नेता न केवल अमीर हैं बल्कि अमीरी के साथ जीते हैं और अमीरों जैसा आचरण करते हैं. 

    कांग्रेस ने यह चिंतन ही नहीं किया कि सत्ता से उसके दूर जाने के वास्तविक कारण क्या हैं? राहुल गांधी के इस डायलॉग में ही सब छुपा है कि कांग्रेस में नेता अमीर है पार्टी गरीब है. नेता मतलब नेतृत्व, चाहे वह नेतृत्व ग्राम, जनपद, जिला, राज्य या राष्ट्रीय हो. निर्वाचित जनप्रतिनिधि चाहे पंचायत नगरीय निकाय, कोऑपरेटिव, विधायक या सांसद हो, सब अपने स्तर पर पार्टी का नेतृत्व करते हैं.

    पार्टी तो एक नाम है, एक ब्रांड है, पार्टी तो नेताओं और कार्यकर्ताओं से बनती है. उनका आचरण और व्यवहार पार्टी का भविष्य है. पॉलिटिक्स भी एक प्रोफेशन है. किसी भी पार्टी के जितने भी नेता हैं उस व्यवसाय के स्टेक होल्डर हैं. कोई भी व्यवसाय हो अगर उससे केवल कमाने की प्रवृत्ति होगी तो फिर वह खत्म ही हो जाएगा. व्यवसाय की निरंतरता के लिए उसमें इन्वेस्ट करना पड़ता है. 

    कांग्रेस की समस्या यहीं से शुरू होती है कि उसका कोई भी नेता पार्टी के लिए अपना धन इन्वेस्ट नहीं करता है. उसकी तो मान्यता है कि पार्टी कमाने के लिए है. इसका एक और कारण हो सकता है कि जब नेता बनने, पद पाने के लिए उसको धन देना पड़ता है तो फिर लेन-देन नेताओं के बीच सिमट जाता है.

    कांग्रेस के निर्वाचित जनप्रतिनिधि सबसे ज्यादा बिकते हुए पाए जाते हैं. नेता पार्टी से ज्यादा अपनी अमीरी का ही ध्यान रखते हैं. जहां से ज्यादा धन मिलता है उसको वोट करते हैं. राज्यसभा के निर्वाचन में भी कांग्रेस क्रॉस वोटिंग का शिकार हुई है. मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार कांग्रेस की विक्रय क्षमता और नेताओं का खुद के लिए धन प्रबंधन में पार्टी को कुर्बान करने का उदाहरण हमारे सामने है.

    राजनीति धनकेंद्रित हो गई है. बिना धन के कोई राजनीतिक दल राजनीति में मुकाबला नहीं कर सकता है. राहुल गांधी कहते हैं कि अगर कांग्रेस अमीर बन जाएगी तो वह बीजेपी हो जाएगी. कांग्रेस के नेता भले अमीर बन जाएँ लेकिन पार्टी को गरीब रखकर वह बीजेपी से मुकाबला नहीं करना चाहते हैं. कांग्रेस पार्टी अपनी सरकारों के समय पार्टी के संगठन, कार्यालय तथा अधोसंरचना के क्षेत्र में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं कर सकी. इसका कारण यही रहा कि जो भी धन आता था वह नेताओं की जेबों में चला जाता था. उनकी अमीरी बढ़ती जाती थी.

    राजनीतिक दल को चुनाव तो पावर से मुकाबले में ही लड़ना होगा. चाहे संगठन का पावर हो, चाहे फाइनेंशियल पावर हो, राष्ट्रीय दल के रूप में कांग्रेस का मुकाबला भाजपा से है. बीजेपी की संगठन क्षमता और उसके नेताओं और केडर में संगठन के प्रति तन-मन-धन से समर्पण देखने लायक होता है. कोई भी संगठन बिना समर्पण के कैसे चलेगा? बीजेपी में तो संगठन को धनराशि समर्पण के लिए अभियान तक चलाए जाते हैं.

    कांग्रेस में सीएम बनने के लिए धन देना पड़ता है. पार्टी का टिकट लेने के लिए पैसा देना पड़ता है, यह आरोप कांग्रेस के सीनियर नेता लगाते हैं. तेलंगाना के मुख्यमंत्री अगर यह कहते हैं जरूरत पड़े तो गांधी परिवार के लिए 1000 करोड़ रुपए जुटाकर दे सकते हैं. उन्होंने यह नहीं कहा कि पार्टी के लिए दे सकते हैं. उनका यह अप्रोच आकस्मिक नहीं है. जो पार्टी किसी परिवार से चलती है, पार्टी में कोई भी पद पाने और कायम रखने के लिए उसी परिवार को खुश करना पड़ेगा.

    कांग्रेस में नेता अमीर कैसे बन रहे हैं?  नेताओं की अमीरी के लिए जनहित को किस सीमा तक कुर्बान किया जा रहा  है? राज्य के संसाधनों का कितना दुरुपयोग किया जा रहा है? नेता अपनी समृद्धि के लिए विरोधियों से हाथ मिलाकर किस तरह से धन उगाही कर रहे हैं? कोई भी पार्टी अपने किसी भी नेता को जानबूझकर भ्रष्टाचार करने की तो अनुमति नहीं दे सकती. 

    अनुमति देना एक बात है लेकिन कोई आदमी भ्रष्टाचार कर रहा है, इसके प्रति आंखें मूंदे रखना भी उसको समर्थन देना ही है. ऐसे व्यक्ति को पद देना भी करप्शन का समर्थन है. किसी का भी अमीर होना गुनाह नहीं है. बस मेहनत ईमानदारी से यह उपलब्धि होना चाहिए. इसके लिए भ्रष्टाचार और पार्टी तथा पद को बेचकर अमीर बनने की बेईमानी गरीबी से भी ज्यादा गरीबी होती है.

    नेताओं की अमीरी पार्टी पर संकट बन आई है तो फिर नेता नहीं पार्टी को अमीर बनाना संसदीय व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करेगा. राहुल गांधी या कोई दूसरा कांग्रेस का नेतृत्व यह कहकर अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकता कि नेता मालामाल हैं और पार्टी कंगाल है. यह स्थिति नेतृत्व पर ही सबसे बड़ा सवाल है. 

    नेतृत्व नेताओं की अमीरी और उसके सोर्सेस से अनभिज्ञ होगा ऐसा तो नहीं कहा जा सकता, बल्कि इसका उल्टा नेताओं के करप्शन का जल गंगोत्री से लगाकर गंगासागर तक जाता है. नेताओं की अमीरी राहुल गांधी की मजबूरी कमजोरी या हिस्सेदारी है यह तो अंतरात्मा ही बताएगी.