अभी तक हर पच्चीस साल में परिसीमन होता रहा है. नया परिसीमन केंद्र में मोदी सरकार के दिशा निर्देशों के अनुरूप होगा. यह दिशा निर्देश विधि सम्मत ही होंगे लेकिन ना मालूम क्यो, राजनेताओं को मोदी और शाह से डर लगता है?  विपक्षी ही नहीं भाजपाई भी भयाक्रांत  रहते हैं.

    राष्ट्रीय जनगणना के बाद परिसीमन का विधान आएगा फिर उसके बाद यह प्रक्रिया पूरी होगी. परिसीमन आयोग बनेगा. परिसीमन के आधार तय किए जाएंगे. परिसीमन अमल में आने में अभी काफी समय है लेकिन फिर भी इस पर विवाद अभी से खड़ा किया जा रहा है. तमिलनाडु से डीएमके अध्यक्ष स्टालिन इसको उत्तर-दक्षिण का मुद्दा बना रहे हैं. स्टालिन की अध्यक्षता में चेन्नई में परिसीमन के विरोध में एक बैठक हो चुकी है.

    परिसीमन का आधार क्योंकि जनसंख्या होती है इसलिए स्टालिन इस आधार को दक्षिण के राज्यों के खिलाफ बता रहे हैं. उनका आरोप है कि दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण पर बेहतर ढंग से अमल किया है इसलिए जनसंख्या के आधार पर चाहे परिसीमन हो, चाहे केंद्रीय कर और सहायता की हिस्सेदारी हो, उसमें दक्षिण को नुकसान होगा. उनका यह भी आरोप है कि उत्तर भारत की जिन राज्यों ने  जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि की है उन्हें परिसीमन का भी लाभ होगा और केंद्रीय राशियों में हिस्सेदारी भी ज्यादा होगी. 

    स्टालिन यह भी आरोप लगा रहे हैं चूँकि, बीजेपी का उत्तर भारत में वर्चस्व है इसलिए पार्टी परिसीमन में यही प्रयास करेगी कि, उत्तर भारत में लोकसभा की सीटें बढ़ें. दक्षिण भारत में लोकसभा सीटें कम होने से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर होगा. यह भी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री आरोप लगा रहें हैं.

    महिला आरक्षण भी जनगणना के साथ ही प्रभावशील होगा इसलिए अभी यह निश्चित नहीं है कि,  परिसीमन की प्रक्रिया क्या होगी. नए सिरे से विधानसभा और लोकसभा की सीटों के निर्धारण का आधार क्या होगा. इस पर निर्णय राष्ट्रीय जनगणना के बाद ही तय होगा.

    तमिलनाडु से शुरू दक्षिण उत्तर की राजनीति को हवा कांग्रेस भी दे रही है. कर्नाटक और तेलंगाना की कांग्रेस सरकारें भी स्टालिन की भाषा में बोल रही हैं. कांग्रेस का उत्तर भारत में जनाधार बीजेपी के मुकाबले लुप्त जैसा हो गया है. इसलिए कांग्रेस दक्षिण भारत में अपनी संभावना देखते हुए पैर पसार रही है.

    परिसीमन के राजनीतिक फॉल आउट अपनी जगह है लेकिन बदलाव प्रकृति का नियम है. परिसीमन में सीटों का स्वरूप बदलेगा. सीटों के आरक्षण का स्वरूप भी बदलेगा. अभी यह कोई भी नहीं कह सकता कि, कौन सी सीट किस वर्ग के लिए नए परिसीमन में आरक्षित होगी.

    महिला रिजर्वेशन लागू करने के लिए किस तरीके से व्यवस्था प्रभावशील की जाएगी. क्या महिलाओं के लिए सीटों की संख्या अलग से निर्धारित की जाएगी. यह सब भविष्य के गर्भ में है लेकिन इस पर राजनीति चरम पर चल रही है.

    वर्ष 2025 के बाद लोकसभा की सीटों के परिसीमन की बात ने पहले से मौजूद उत्तर दक्षिण विभाजन को बहुत गहरा कर दिया है. दक्षिणी राज्य लंबे समय से इस बात से दुखी हैं कि, जनसंख्या नियंत्रण पर उनके बेहतर प्रदर्शन के लिए उन्हें दंडित किया जाता है. भारत सरकार के केंद्रीय सहायता और केंद्रीय करों  में राज्यों के हिस्से के बंटवारे में जनसंख्या ही महत्वपूर्ण कारक है.

    कई तरीकों से केंद्रीय सहायता राज्यों में प्रवाहित होती है. इनमें से प्रत्येक प्रवाह में राज्य की हिस्सेदारी निर्धारित करने में जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. वित्त आयोग द्वारा राज्यों को किया जाने वाला हस्तांतरण सबसे महत्वपूर्ण है. इसके तहत केंद्र सरकार अपने द्वारा एकत्र किए गए प्रत्येक रुपए में से 41 पैसे राज्यों को देती है. इसके वितरण के लिए आधार तय होते हैं. इनको तय करने में जनसंख्या सबसे बड़ा कारक होती है. जिस राज्य की जनसंख्या जितनी अधिक होगी उसका उतना ही हिस्सा अधिक होगा.

    पन्द्रहवें वित्त आयोग ने अपनी सिफारशें  तैयार करने के लिए वर्ष 2011 की जनगणना का उपयोग किया. इसके पहले तक के वित्त आयोगों को वर्ष 1971 की जनगणना की जनसंख्या का उपयोग करने के लिए कहा जाता रहा है. सोलहवां वित्त आयोग अभी राज्यों का दौरा कर रहा है, संभवत यह भी जनसंख्या के उसी आधार का उपयोग करेगा, जो पिछले आयोग ने किया था.

    केंद्र प्रायोजित योजनाओं में भी जनसंख्या के मान से राज्यों को सहायता मिलती है. इसके अलावा केंद्रीय योजनाओं के रूप में राज्यों को भी योजनाएं दी जाती है. उनके भी राजनीतिक पक्ष होते हैं. जो भी राष्ट्रीय सरकार होती है वह अपने वोट बैंक के अनुसार राज्यों को अधिक योजनाएं देते हैं.

    यह बात तर्कसंगत है कि, जनसंख्या नियंत्रण को सुनिश्चित करने के लिए बेहतर प्रदर्शन करने वाला राज्यों को जनसंख्या की कमी के कारण नुकसान नहीं होना चाहिए. अगर इसके कारण ऐसे राज्यों को नुकसान होगा तो फिर हर राज्य जनसंख्या नियंत्रित करने की बजाय जनसंख्या बढ़ाने का काम करेगा, जो राष्ट्र के हित में नहीं होगा. इसलिए इस पर कोई सामंजस्य पूर्ण फार्मूला तय होना जरूरी है, ताकि सभी राज्यों को समानुपातिक रूप से केंद्रीय संसाधन उपलब्ध हो सकें.

    उत्तर और दक्षिण के तनाव की राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों ही नाजुक हैं. बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी के सामने यह चुनौती है कि, उत्तर दक्षिण की राजनीति को हवा देने वालों को निराशा करें. उत्तर भारत में तो बीजेपी ने काफी हद तक अपना विस्तार कर अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं. दक्षिण भारत में अभी बीजेपी को बहुत मेहनत करनी है. ऐसी हालत में दक्षिणी राज्यों के साथ किसी अन्याय का आरोप बीजेपी बर्दाश्त नहीं करना चाहेगी.

    राज्य की भौगोलिक सीमाएं प्रशासनिक इकाई के रूप में हो सकती है. इंसान और आसमान तो उत्तर-दक्षिण में विभाजित नहीं है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री आने वाले राज्य के चुनाव से भी भयभीत हैं. उन्हें सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है. लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने जिस ढंग से तमिलनाडु में अपना मत प्रतिशत बढ़ाया है, उससे भी उनका चिंतित होना स्वाभाविक है.

     राजनीति के लिए क्षेत्र, भाषा और धर्म के आधार पर कोई भी विभाजन राष्ट्र के लिए नुकसान है, तो सियासत इसी में अपना भविष्य तलाशती है. देश के लोगों को विभाजन में भविष्य तलाशने की राजनीति को कमजोर करने का समय आ गया है. परिसीमन और केंद्रीय संसाधन हस्तांतरण में नुकसान के बहाने उत्तर-दक्षिण बांटने की सियासी द्यूतक्रीड़ा भारत को बाँट नहीं सकेगी.