बांस मिशन के स्लोगन में आकर ठगे गए किसान, नहीं मिल रहा कोई खरीददार, अफसरों ने खड़े किए हाथ


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स्टोरी हाइलाइट्स

नर्मदापुरम-हरदा से लेकर देवास, धार और खंडवा किसान अब बांस लगाकर पछताह रहें..!!

भोपाल। 'बांस लगाओ -लाख कमाओ' स्लोगन मध्य प्रदेश में बांस मिशन (Bamboo Mission) के अफसरों ने दिया। सब्जबाग़ दिखाने वाले स्लोगन अब किसानों को धोखा लगने लगा। किसानों के खेत में खड़ी बांस की फसल का अब स्पॉट पर कोई खरीददार नहीं मिल रहा है। इसकी वजह से किसान बांस की खेती नष्ट करने लगे हैं। 5 साल के नुकसान के बाद किसान जगदीश कुमार ने 25 एकड़ का प्लांटेशन जेबीसी से नष्ट कर दिया। यह समस्या नर्मदापुरम और हरदा से लेकर देवास, धार और खंडवा के किसानों की है।लेकिन यह भी सच है कि सरकार बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी दे रही है। 

हरदा जिला अंतर्गत खिरकिया किसान रवि का कहना है कि हमारे पास 4 एकड़ जमीन में बांस है, जो कटाई के लिए तैयार है। हम 6 महीने से अधिक समय तक बांस बेचने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कोई भी देखने या बेचने के लिए नहीं आया है। उन्होंने बांस मिशन किसानों के लिए अभिशाप है, हम यहां फंस गए हैं। ये स्थिति सभी बांस किसानों की है। धार जिले के रिंगनोद के किसान जगदीश कुमार का कहना है कि 1 अगस्त 2017 में तीन बीघा में करीब 1005 बांस के पौधे लगाए थे। मुआवजा बामुश्किल मिला। वह भी तब जब एसडीओ को रिश्वत दी। सेकंड और थर्ड किस्त नहीं मिली। तत्कालीन फॉरेस्ट के अधिकारियों ने जिस कंपनी से अनुबंध किया था वह कंपनी भी बंद हो गई। आज स्थिति यह है कि तीन बीघा बांस की खेती पर जेसीबी चला कर नष्ट कर दी है। ऐसा मैंने अकेले में नहीं किया बल्कि आठ किसानों ने बांस की खेती पर जेसीबी चला दी है। 

लगातार हो रही है हानि, अफसरों ने खड़े कर दिया हाथ

देवास जिले के हरिप्रसाद बताते हैं कि पिछले वित्तीय वर्ष में बांस की खेती में 30 से 40 हजार रुपए की हानि हुई है। उन्होंने बताया कि बांस मिशन के अधिकारियों और तत्कालीन एसीएस के कहने पर बांस लगाया। अधिकारियों ने देवास की आर्टीशन एग्रोटेक देवास से अनुबंध भी कराया। अफसरों ने आर्टिसन देवास से बायबैक की गारंटी दिलाई। बाद में आर्टीशन एग्रोटेक कंपनी देवास का मालिक देव मुखर्जी भारत छोड़कर भाग गया। इसकी वजह से सैकड़ों किसान ठगे गए। मिशन के अधिकारियों ने किसान की मदद करने हाथ खड़े कर दिए। हरिप्रसाद अकेले ऐसे किसान नहीं है, जो ठगे नहीं गए। करीब 300 से अधिक किसानों ने बांस की खेती से तौबा कर लिया। 

9 माह से अनुदान नहीं मिला

नर्मदापुरम जिले के किसान प्रवीण रघुवंशी ने बताया कि अप्रैल 2025 में राज्य बांस मिशन योजना के अंतर्गत हम सभी किसानों द्वारा अपनी निजी भूमि में बांस पौधों का रोपण किया गया। राज्य बांस मिशन योजना के तहत 9 माह पहले लगाएं बांस के पौधों की अनुदान राशि का भुगतान अब तक नहीं हो पाया है। नर्मदापुरम जिले के सैकड़ों किसान अनुदान राशि की पहली और दूसरी किस्त के लिए परेशान हो रहे है। राज्य बांस मिशन योजना के तहत 9 माह पहले लगाएं बांस के पौधों की अनुदान राशि का भुगतान अब तक नहीं हो पाया है। जिले के सैकड़ों किसान अनुदान राशि की पहली और दूसरी किस्त के लिए परेशान हो रहे है।

क्या है योजना में कमियां

बांस मिशन योजना मप्र वर्ष 2025 की गाइडलाइन अनुसार प्रथम किस्त 60/- रुपए प्रति पौधा माह अगस्त सितम्बर और द्वितीय किस्त 30/- रुपए प्रति पौधे के हिसाब से नवंबर-दिसम्बर में भुगतान होना चाहिए था। लेकिन अब तक प्रथम और द्वितीय किस्त का भुगतान नहीं हो पाया है। रोपण के बाद बांस पौधों की जीवितता के आधार पर वन विभाग के द्वारा बांस मिशन की गाइडलाइन अनुसार बांस पौधों का सत्यापन करवाया जाता है, और इसी सत्यापन में प्राप्त जीवितता के आधार पर हम कृषकों को अनुदान मिलता है। विभाग द्वारा सत्यापन भी समय पर नहीं किया जाता। अगर सत्यापन हो भी जाता है तो भुगतान 6 से 8 माह बाद भी नहीं हो पाता है। राज्य बांस मिशन योजना में प्राप्त होने वाले अनुदान से ही हमारे द्वारा बांस पौधों का रखरखाव, निदाई गुड़ाई, खाद, दवाई, मृत पौधे बदलना, मजदूरी का भुगतान आदि खर्च किए जाते हैं। लेकिन समय पर अनुदान प्राप्त नहीं होने पर पर हमारे द्वारा उक्त कार्य समय पर नहीं हो पा रहे। लेकिन समय पर अनुदान प्राप्त नहीं होने पर पर हमारे द्वारा उक्त कार्य समय पर नहीं हो पा रहे हैं, जिससे हमारे पौधे मर जाते है या रोगग्रस्त होकर सूख जाते है, जो हमारे आर्थिक नुक़सान को बढ़ा देता।

योजना के क्रियान्वयन में है खामियां

किसानों से हुई बातचीत में यह तथ्य उभरकर आया कि अधिकारी ख़ासकर डीएफओ और उनके एसडीओ-रेंजर मिशन में अधिमान्यता प्राप्त नर्सरी से पौधे खरीदने के लिए दबाव बनाते हैं। जबकि उनके पास ऐसा कोई मेकैनिज्म नहीं है, जो किसानों को गारंटी दे सके कि पौधे की क्वालिटी गुणवत्ता युक्त है। कई किसानों ने बताया कि मिशन के अफसरों के दबाव में उनके बताए नर्सरी से बांस के पौधे खरीदें पर वह गुणवत्ताविहीन निकले। जब इस बात की शिकायत अफसरों से की तब उन्होंने हाथ खड़े कर दिए।

व्हाट्सएप ग्रुप में चली बहस का प्रमुख हिस्सा 

राज्य बांस मिशन ने एक व्हाट्सएप ग्रुप बना रखा है। पिछले दिनों व्हाट्सप्पग्रुप पर किसानों और मिशन से जुड़े आरके चतुर्वेदी और सत्यनारायण पटेल के बीच तीखी नोंक-झोंक हुई। इस बहस के बाद ग्रुप पर एक तरफा पोस्ट करने की व्यवस्था कर दी गई है। ग्रुप पर हुई बहस की बनागी इस प्रकार है। सत्यनारायण पटेल का कहना है कि बांस लगवाने वाले पहले सुनहरे सपने दिखाते हैं और बाद में रफी टक्कर हो जाते हैं। बस जी का जंजाल बन गया है बस कैलकुलेटर में हिसाब जोड़कर लखपति बने रहो। इस पर राजवीर पवार का कहना था कि सतनारायण पटेल जी, हम केवल आर्थिक पक्ष के बारे में नहीं सोचे बल्कि पर्यावरण के मध्य नजर ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज जिसका असर खेती किसानी पर पड़ता है उसको ध्यान में रखकर बांस पौधारोपण करना चाहिए। इसके जवाब में पटेल का बयान है कि पर्यावरण के बारे में सोच कर ही तो हमने बस का पौधा रोपण किया था पर अब यही सोच हमारे ऊपर भारी पड़ रही है. राजवीर घर बेचकर गंगा जी कोई नहीं जाता वहीं हो रहा है किसानों के साथ बात मिशन में।

बांस मिशन और खेती से जुड़ी प्रमुख शिकायतें इस प्रकार हैं

सब्सिडी भुगतान में देरी: नर्मदापुरम जिले में सैकड़ों किसान राज्य बांस मिशन योजना के तहत भुगतान न मिलने के कारण परेशान हैं। किसानों का आरोप है कि उन्होंने अप्रैल 2025 में पौधे लगाए थे, लेकिन लंबे समय बाद भी उन्हें अनुदान राशि नहीं मिली है।

निजी कंपनियों का दबाव और महंगा सौदा: बड़वानी जिले के एक किसान ने शिकायत की थी कि बांस मिशन के अधिकारियों ने उन्हें सरकारी नर्सरी (जहाँ पौधे ₹5 में उपलब्ध थे) के बजाय एक निजी कंपनी से ₹35 में पौधे खरीदने के लिए मजबूर किया। इस मामले में गड़बड़ी की शिकायत लोकायुक्त तक भी पहुँची थी।

बायबैक गारंटी में समस्या: हालांकि कुछ मामले अन्य राज्यों के भी हैं, लेकिन निजी कंपनियों द्वारा बांस खरीदने का वादा (बायबैक) करके मुकर जाना किसानों के लिए बड़ी चुनौती रहा है।
अवैध वसूली के आरोप: कुछ मामलों में निजी फर्मों ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के नाम पर किसानों से प्रति एकड़ हजारों रुपये जमा कराए और बाद में संपर्क तोड़ दिया।