प्राण प्रतिष्ठा: नॉर्थ में रिस्क लेकर साउथ को साधने की कवायद में कांग्रेस


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स्टोरी हाइलाइट्स

राम मंदिर के आयोजन से दूरी के तलाशे जा रहे निहितार्थ

राम मंदिर के लोकार्पण समारोह से कांग्रेस के किनारा करने के कई सियासी अर्थ सामने आ रहे हैं। कांग्रेस ने करीब तीन सप्ताह तक मंथन के बाद यह फैसला किया है। इसके जरिये उसने गठबंधन को संदेश देने की कोशिश की है और साथ खड़े होने का माद्दा दिखाया है। क्योंकि कई सहयोगी दलों को न्योता नहीं मिला था। इसके अलावा नार्थ के मुद्दे पर साउथ को साधने का जतन भी नजर आ रहा है। हालांकि इसे लेकर पार्टी में खींचतान और विरोध में आवाज उठी है। 

गुजरात में कांग्रेस के अध्यक्ष अंबरीश डेर, विधायक अर्जुन मोढवाडिया, यूपी कांग्रेस से आचार्य प्रमोद कृष्ण ने फैसले का विरोध किया है। जबकि हाइकमान ने साफ किया है कि हमारे जिन नेताओं को न्योता मिला है, वे नहीं जाएंगे। दरअसल, कांग्रेस की बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इससे पहले कांग्रेस खुद को राम और राम मंदिर से जोड़ती आ रही है। मंदिर का ताला खुलवाने का भी श्रेय लेती रही है वह सॉफ्ट हिंदुत्व का कार्ड भी खेलने से नहीं हिचकती है। 

जानकारों का कहना है कि बीजेपी ने जब साफ कर दिया है कि वो राम मंदिर के मुद्दे को भुनाएगी और कांग्रेस को घेरने के लिए 'हिंदू विरोधी' के रूप में प्रचारित करने में कसर नहीं छोड़ेगी, ऐसे में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का निर्णय बीजेपी के एजेंडे में ना फंसने का हो सकता है क्योंकि कांग्रेस खुद को धर्मनिरपेक्ष पार्टी कहती है। उसका बड़ा वोट बैंक है। 

नेतृत्व का डर है कि अगर वो अयोध्या जाती, तब भी बीजेपी घेरती तो बीजेपी के एजेंडे में फंस सकती थी। दूसरी तरफ देश में मुस्लिम वोटर्स की संख्या करीब 15 प्रतिशत है। लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा मुस्लिम वोट कांग्रेस को ही मिलते हैं। कांग्रेस अगर अयोध्या जाती तो इससे एक बड़ा वर्ग नाराज होता।

खास यह कि चारों शंकराचार्यों ने इस कार्यक्रम की रूपरेखा पर सवाल उठाते हुए दूरी बना ली है। पूरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के बाद अब द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस कार्यक्रम का खुले तौर पर विरोध किया। वहीं बाकी दो शंकराचार्यों ने अन्य माध्यमों से बयान देते हुए इस कार्यक्रम में शामिल होने से इंकार किया है।