११ सितम्बर: आज के दिन स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में दिया था ये भाषण … दंग हो गए थे श्रोता

स्वामी विवेकानन्द आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि हैं। विशेषकर भारतीय युवकों लिए स्वामी विवेकानंद बढ़कर दूसरा कोई नेता नहीं हो सकता। हमारे भूतपूर्व प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू  ने बहुत पहले ही स्वामीजी के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा था: "मैं नहीं जानता हमारी युवा पीढ़ी में कितने लोग स्वामी विवेकानन्द के भाषणों और लेखों को पढते हैं। परन्तु मैं उन्हें यह निश्चित बता सकता हूँ कि, मेरी पीढ़ी के बहुतेरे युवक उनके द्वारा अत्यधिक मात्रा में प्रभावित हुए थे। मेरे विचार में, यदि वर्तमान पीढी के लोग स्वामी विवेकानंद के भाषणों और लेखों को पढ़े तो उन्हें बहुत बड़ा लाभ होगा और वे बहुत कुछ सीख पाएँगे। यदि तुम स्वामी विवेकानन्द के भाषणों और लेखों को पढो तो तुम्हें यह आश्चर्यकारक बात दिखाई देगी कि वे कभी पुराने नहीं प्रतीत होते।

स्वामी विवेकानंद वैदिक धर्म एवं संस्कृति के समस्त स्वरूपों के उज्ज्वल प्रतीक थे। यह उन्हीं की प्रतिभा थी जिसे वेदान्त का प्रतिपादन इस रूप में हुआ कि वह वर्तमान युग के मनुष्य द्वारा हृदयंगम किया जा सके। केवल भारत ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व स्वामी जी के स्फूर्तिदायी एवं विधायक विचारों द्वारा प्रचुर मात्रा में लाभान्वित हुआ है; स्वामी जी की वे विचारधाराएँ मानव के समस्त कार्यक्षेत्रों में यथार्थतः सहायक है। आज के वैज्ञानिक युग में मनुष्य के सम्मुख अनेकानेक समस्याएँ उपस्थित हुई हैं - स्वामीजी इन सभी समस्याओ से परिचित थे तथा उन्हें यथार्थ रूप से समझ भी सके थे। फलतः उन सब के लिए उन्होंने उपाय तथा मार्ग भी प्रदर्शित किये हैं और ये सारे मार्ग उन चिरन्तन सत्यों पर आधारित है जो वेदान्त तथा विश्व के अन्य महान् धर्मो में निहित हैं। स्वामी विवेकानंद ने आज के ही दिन ११ सितम्बर १८९३ ई. विश्व धर्म-महासभा, शिकागो में एक संक्षिप्त भाषण दिया था ये उनके भाषणों की श्रंखला में से एक था ... न्यूज़ पुराण पर आप भी इस भाषण को पढ़कर उर्जित हो सकते हैं| 

व्याख्यान : धर्म-महासभा स्वागत का उत्तर

(विश्व धर्म-महासभा, शिकागो, ११ सितम्बर १८९३ ई.)

Original  Voice of Swami Vivekananda recorded on  Sept 11, 1893, स्वामी जी की  आवाज

अमेरिकावासी बहनो तथा भाइयो,

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सब से प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ: धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।

मैं इस मंच पर से बोलने के उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रसारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीडितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से पूल में मिला दिया गया था ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने महान् जरथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाइयो, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियों सुनाता हूँ, जिसकी आवृत्ति मैं अपने बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृत्ति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते है।


रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम् । नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ।।

'जैसे विभित्र नदियाँ भित्र भित्र स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो । भित्र भित्र रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीघे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमे ही आकर मिल जाते हैं।

यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है, स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत् के प्रति उसकी घोषणा है:


ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।मम वानी वर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ।।  

जो कोई मेरी ओर आता है- चाहे किसी प्रकार से हो -मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।

साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी बीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं, उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को विध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं । यदि ये बीभत्स दानवीर न होतीं, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया है, और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टाध्वनि हुई है, वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का, तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होनेवाले मानवों की पारस्परिक कटुताओं का मृत्युनिनाद सिद्ध हो ।


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