भारत की आज़ादी की इबारत पहले ही लिख दी थी स्वामी विवेकानंद ने

हजारों साल की गुलामी से उपजी आत्महीनता और जड़ता से मुक्त किया देश को
युवाओं से किया था राष्ट्र के लिए जीने का आह्वान
भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आज़ादी भले ही 15 अगस्त 1947 को मिली हो, लेकिन इसकी इबारत स्वामी विवेकानंद ने 1893 में ही लिख दी थी.हजारों साल की गुलामी से भारतवासियों में गहरी आत्महीनता आ गयी थी. उनका आत्मविश्वास पूरी तरह नष्ट हो गया था. युवाओं में बहुत भटकाव था. वे भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रति निहित स्वार्थों द्वारा किये गये दुष्प्रचार के प्रभाव में आकर अपने ही अतीत से नफरत करने लगे थे. धर्म के गहरे अर्थों को तिलांजलि देकर भारतीय उसके बाहरी स्वरूप में उलझकर रह गये थे. स्त्रियों और समाज के निचले समझे जाने वाले वर्गों की हालत बहुत दयनीय थी. चारों तरफ घोर गरीबी और पिछड़ापन था.
दूसरे देशों, विशेषकर पश्चिमी देशों में भारत की छवि सर्प और पेड़ों की पूजा करने वाले तथा जादू-टोने, अंधविश्वास में जीने वाले बहुत पिछड़े देश की बन गयी थी या बना दी गयी थी.
ऐसी विपरीत परिस्थितयों में स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में पूरे विश्व को भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति का सही स्वरूप इतने प्रभावी ढंग से समझाया कि पूरे विश्व ने इसे स्वीकार किया. स्वामीजी ने विश्व के सामने वेदांत दर्शन के साथ-साथ वैदिक सभ्यता, संस्कृति और उसकी व्यापकता को उजागर किया.
भारत के धर्म, संस्कृति और सभ्यता ही नहीं इसके इतिहास और सामाजिक-आर्थिक जीवन के विषय में स्वामी विवेकानंद को इतना विषद और गहरा ज्ञान था की कविवर रविन्द्रनाथ टेगोर ने कहा था की यदि भारत को समझना हो, तो स्वामी विवेकानंद को पढना चाहिए.
सचमुच बंगाल के एक कायस्थ परिवार में पैदा होने वाले नरेंद्र के स्वामी विवेकानंद बनाने की यात्रा को देखने से पता चलता है कि उन्होंने कितनी गहन और लम्बी साधना कर यह मुकाम हासिल किया.
अपने गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस से दीक्षा और समाधि का अनुभव प्राप्त करने पर उन्होंने हिमालय पर जाकर अपने मोक्ष के लिए तपस्या करने की इच्छा जतायी. परमहंस ने उन्हें धिक्कारते हुए कहा कि जब करोड़ों भारतवासी दरिद्रता, पिछड़ेपन, अज्ञान और अन्धविश्वास के अँधेरे में जी रहे हैं, तो व्यक्तिगत मोक्ष की कामना करना घोर पाप है. तुम भारतवासियों को इस अन्धकार से निकालो, इसीसे तुम्हें मोक्ष मिलेगा.
इसीलिए स्वामीजी ने अमेरिका से लौटने के बाद भारत में निम्न कहे जाने वाले वर्गों के उत्थान के लिए निरंतर प्रयास किया और देशवासियों, खासकर युवाओं को इस दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया. इन लोगों के प्रति उनका हृदय करुणा से भरा था. उन्होंने कहा कि-“ हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय पाप जन-समुदाय की उपेक्षा है, और यही हमारे पतन का एक कारण है”. उन्होंने कहा- तुम अपने देश के लोगों की और एक बार देखो तो, मुँह पर मलिनता की छाया, कलेजे में न साहस, न उल्लास, पेट बड़ा, हाथ-पैरों में शक्ति नहीं;डरपोंक रु कायर! असली राष्ट्र जो झोपड़ियों में निवास करता है, वह अपना व्यक्तित्व  खो चुका है.
स्वामीजी भारत के पुनरुत्थान के प्रति बहुत आश्वस्त थे. इसमें वह भारत के युवाओं की भूमिका बहुत अहम् मानते थे. उन्होंने कहा कि-“ भारत का पुनरुत्थान होगा, वह जड़ की शक्ति से नहीं, बल्कि आत्मा की शक्ति से. यह उत्थान विनाश की ध्वजा लेकर नहीं, बल्कि शान्ति और प्रेम की ध्वजा लेकर होगा.
भारत के उत्थान और नव-निर्माण में स्वामीजी युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानते थे. वह चाहते थे की युवा अपनी संस्कृति और सभ्यता के साथ आगे तो बढ़ें. उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि- “तुम लोग संस्कृत और अंग्रेजी दोनो पढो। संस्कृत इसलिए कि अपने देश, अपने धर्म , अपने प्राचीन ज्ञान को जान सको और अंग्रेजी इसलिए कि पश्चिम से आए आधुनिक ज्ञान से परिचित हो सको।”
स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि-“हे भाग्यशाली युवा, अपने महान कर्तव्य को पहचानो। इस अद्भुत सौभाग्य को महसूस करो। इस रोमांच को स्वीकार करो। जब तुम जीवन की सफलता की बात करते हो तो इसका मतलब सभी आवश्यकताओं- या इच्छाओं की पूर्ति कर लेना भर नही है। इसका तात्पर्य सिर्फ नाम कमाना या पद प्राप्त करना या आधुनिक दिखने के लिए फैशनेबल तरीकों  की नकल करना या अप-टू-डेट होना नही है।
उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि-“हे अमृत के अधिकारीगण! तुम तो ईश्वर की संतान हो, अमर आनंद के भागीदारी हो, पवित्र और पूर्ण आत्मा हो तुम इस मर्त्यभूमि- पर देवता हो। उठो! आओ! ऐ सिंहो! इस मिथ्या भ्रम को झटककर दूर फेंक दो कि तुम भेंङ हो।
इस सन्दर्भ में स्वामीजी द्वारा 10 जुलाई 1893 को याकोहामा से भारत के युवाओं को लिखा गया पत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है. इस पत्र के कुछ अंश इस प्रकार हैं-
“यह बङे संतोष की बात है कि, अब तक हमारा कार्य बिना रोक टोक के उन्नति ही करता चला आ रहा है। इसमें हमें सफलता मिलेगी, और किसी बात की आवश्यता नही है, आवश्यकता है केवल प्रेम, निष्कपटता और धैर्य की”.
“परोपकार ही जीवन है, परोपकार न करना ही मृत्यु है। ऐ बच्चों, सबके लिये तुम्हारे ह्रदय में दर्द हो- गरीब, अज्ञानी, पददलित मनुष्यों के दुख का तुम अनुभव करो, संवेदना से तुम्हारा ह्रदय भरा हो। यदि कुछ भी संशय हो तो सबकुछ ईश्वर के समक्ष कहदो, तुरन्त ही तुम्हें शक्ति, सहायता और अदम्य साहस का आभास होगा। गत दस वर्षो से मैं अपना मूलमंत्र घोषित करता आया हुँ- प्रयत्न करते रहो। और अब भी मैं कहता हूँ कि अकिंचन प्रयत्न करते चलो। जब चारो ओर अंधकार ही अंधकार था, तब भी मैं प्रयत्न करने को कहता था, अब तो कुछ प्रकाश नजर आ रहा”
स्वाधीनता के बिना किसी प्रकार की उन्नति संभव नही है। हमारे पूर्वजों ने धार्मिक चिंता में हमें स्वाधीनता दी थी और उसी से हमें आश्चर्यजनक बल मिला है. दूसरों को हानि न पहुँचाते हुए, मनुष्य को विचार और उसे व्यक्त करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिये. साहसी बच्चों, आगे बढो- चाहे धन आए या न आए, आदमी मिलें या न मिलें, तुम्हारे पास प्रेम है। क्या तुम्हे ईश्वर पर भरोसा है ? बस आगे बढो, तुम्हे कोई नही रोक सकेगा। सतर्क रहो। सत्य पर दृढ रहो, तभी हम सफल होंगे शायद थोङा अधिक समय लगे पर हम सफल होंगे। भविष्य की सदी तुम्हारी ओर देख रही है- भारत का भविष्य तुम पर निर्भर है। काम करते रहो.

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