मैं भोज ताल हूँ.. मेरा वैभव अमर रहे : The biggest lake – Bada Talab –

भोपाल ताल अमर रहे

-दिनेश मालवीय

आज वीआइपी रोड से गुजरते हुए बड़े तालाब में उठती ऊँची-ऊँची लहरों को देखकर मन के सरोवर में आनंद की हिलोरें उठने लगीं. लघु समुद्र जैसा लग रहा था. ऐसा लगा गाड़ी रोककर दिनभर उसे निहारता रहूँ, लेकिन यह भी मुमकिन न था. आप कह सकते हैं कि इसमें इतना भावुक होने की क्या ज़रुरत है? ज़रुरत नहीं, यह मेरे ह्रदय में उठे सहज भाव हैं.

मैंने वर्ष 2003 में भोपाल की शान और जीवनरेखा कहे जाने वाले इसी बड़े तालाब को इतना सूखा हुआ देखा था कि मुझे ऐसा लगा कि मेरे अंदर भी कुछ मर गया हो. दरअसल सूखते तालाब की दुर्दशा पर एक डाक्यूमेंट्री बनायी जानी थी. इसकी स्क्रिप्ट लिखने का दायित्व मुझे ही मिला था. मुझे याद है, हम पूरी यूनिट के साथ तालाब के बीच बनी सूफी संत बाबा शाह अली शाह की दरगाह तक पैदल गये थे.

स्क्रिप्ट देखकर मेरे एक साथी ने कहा कि इसका शीर्षक “एक ताल की मौत” रखो. मैं उसकी बात सुनकर बिफर गया. आखिर पैदायशी भोपाली जो ठहरा. वह साथी तो बाहर का था, सो वह ऎसी बात मुँह पर ला सका, लेकिन मेरे लिए तो यह तालाब मेरे घर के बुजुर्ग की तरह है. मैंने उससे कहा कि अभी तुम इस तालाब की असलियत नहीं जानते; यह कभी नहीं मर सकता. बहरहाल, भोपालियों के दिल में अगर उसके प्रति वैसी ही मोहब्बत और जज्वा नहीं रहा और वे उसे बर्बाद होने से नहीं बचा सके, तो यह मुमकिन है.

तो आप समझ गये ना  तालाब को लबालब भरा देखकर मैं इतना भावुक क्यों हो गया?

मैंने उस डाक्यूमेंट्री की जो स्क्रिप्ट लिखी थी वो इस प्रकार थी-


ताल की पुकार

मैं, भोपाल ताल हूं।
मैं, इस शहर की पहचान हूं।
हक़ीक़त यह है कि मैं शहर की जीवनरेखा हूं।
मेरी उम्र कोई एक हज़ार साल है।
मैंने, इस शहर की अनेक पीढ़ियों की प्यास बुझाई है।
मेरी लहरों में खेलते हज़ारों बच्चे, जवान और बूढ़े हुये हैं।
मेरे किनारे लोगों ने रुहानी सुकून पाया है।
मेरे किनारे मंदिर और मस्जिद दोनों बसे हैं।
मंदिरों की घंटियों और मस्जिदों की अजान सुनकर मैं आनंद से नाच उठता हूं।
आज, मैं सिकुड़कर बहुत छोटा रह गया हूं।
अपने सिकुड़ने का मुझे अफसोस नहीं,
लेकिन इस बात की टीस ज़रुर है,
कि आज मेरी बदहाली को देखकर मेरे अपने लोग खामोश है।
मैं यह तो नहीं कहता कि
मेरी इस हालत के लिए मेरे शहर के लोगों ने जानबूझकर कुछ किया,
लेकिन जाने-अनजाने वे भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं।
मैं सब कुछ सहकर भी शहर की प्यास बुझाता रहा,
मगर माफ कीजिए, मेरे लिए अब यह मुमकिन नहीं रह गया है।
गाद जमते-जमते मेरी गहराई लगातार कम होती जा रही है।
वो देखिए, जनाव शाह अली शाह रहमतुल्ला आलिया की मज़ार।
गये साल तक वहां जाने के लिए कश्तियां की जाती थीं।
आज लोग पैदल जा रहे हैं।
गंगा-जमनी रिवायत वाले मेरे अपने लोगों,
मेरे लिए सिर्फ दुआ करना काफी नहीं है।
आप मुझे बचाने आगे भी आइए।
बात अभी हाथ से निकली नहीं है।
आपके बुजुर्ग अगर मुझे बना सकते हैं,
तो क्या आप मुझे बचा भी नहीं सकते।
मेरी हालत अगर यूं ही बिगड़ती गई,
तो ऐसा न हो कि कल आप अपने बच्चों से कहें कि,
इस मैदान में एक तालाब था और बच्चे कहें कि आप झूठ बोल रहे हैं-
इतना बड़ा भी कहीं तालाब होता है !

लिहाजा आप अगर भोपाल के पैदायशी बाशिंदे हों या यहाँ आकर बस गये हों आप सभी से एक ही गुजारिश है कि इस तालाब को हमेशा अपने घर के बुजुर्ग की तरह मानकर इसकी पूरी हिफाजत करें और इसे साफ़-सुथरा रकहने में मदद करें. हम दुआ करें कि यह अमर रहे. आने वाली हजारों-हज़ार पीढ़ियाँ इससे जीवन पाती रहें और इसकी लहरों से अठखेलियाँ करते हुए बड़ी होती रहें.

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