राधा का असली रूप, कौन थी राधा? श्री राधा के रहस्य

श्री राधा के बिना श्री कृष्ण क्षण भर भी नहीं रह सकते थे। वे संपूर्ण कामनाओं का साधन (साधन) करती है, इस कारण उनका नाम श्री राधा है।

जिस प्रकार श्री कृष्ण ब्रह्मस्वरूप है या प्रकृति से परे हैं, ठीक उसी प्रकार श्री राधा जी भी ब्रह्मस्वरूप, निर्लिप्त एवं प्रकृति से परे है।

जब जब भगवान का इस धरा पर आविर्भाव तिरोभाव हुआ करता है। तब-तब भगवान की भांति उनका भी आविर्भाव तिरोभाव होता है। वे भी श्री हरि कि भांति अकृत्रिम, नित्य और सत्य स्वरूप है।

नारद पांचरात्र के अनुसार श्री राधा जी भगवान की निजस्वरूपा शक्ति होने के कारण भगवान से सर्व या अभिन्र है और समय-समय पर लीला करने के लिए आविर्भूत-तिरोभूत हुआ करती है।

श्रीमद् भागवत में कहा गया है अगर श्री राधा को पूजा न की जाए तो मनुष्य को श्री कृष्ण की पूजा करने का अधिकार नहीं रखता। अतः सभी वैष्णवों को चाहिए के वे श्री राधा की पूजा अवश्य करें।

ये श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं। यहीं कारण हैं कि भगवान इनके अधीन रहते हैं। वे भगवान के रास की नित्य अधीश्वरी है। श्री राधा के बिना श्री कृष्ण क्षण भर भी नहीं ठहर सकते। ये संपूर्ण कामनाओं का राधन (साधन) करती है, इसी कारण इनका नाम श्री राधा है।

वैदिक शास्त्रों में श्री कृष्ण की तीन प्रमुख शक्तियों का उल्लेख मिलता है, जिनमें से एक अंतरंग शक्ति का अधिष्ठात्री हैं राधा रानी। राधा के हो दिव्य नेत्रों की आहलादिनी शक्ति को निहारने मात्र से बंसीधर की बंसी हाथ से गिर जाती है। कोतुहलवश शीश पर सजा मोरपंख और कमर पर लिपटा पीताम्बर अस्त-व्यस्त होकर धरा की शरण ग्रहण करते हैं। क्या ऐसा दिव्य प्रेम व
अलौकिक आनंद प्राप्त करने वाली राधा रानी की सेवा करने का अवसर मुझे प्राप्त हो सकेगा। (राधा-रस-सुधानिधि)।

पदम रत्नाकर के अनुसार चंद्रमा और कलावती की दस हजार वर्षों की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने उन्हें वर मांगने को कहा। सुचंद्र और कलावती कहने लगे- प्रभु हमें भगवान विष्णु की आहलादिनी शक्ति को अपनी पुत्री के रूप में जन्म देने का वर दें। ब्रह्मदेव तथास्तु कहकर अंर्तध्यान हो गए।

कालान्तर में यही पति-पत्नी राजा वृषभानु तथा कीर्तिदा को दर्शन दिए। वे उस कन्या को अपने घर ले आए, वह अष्टमी का दिन था तथा भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को अभिजीत मुहूर्त और अनुराधा नक्षत्र था।

इस विलक्षण कन्या के जन्म का समाचार सारे नगर में फैल गया। लोग जश्न मनाने लगे तथा राजा को बधाई दी जाने लगी। तभी से इस दिन को राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा। श्री राधा जी के प्राकट्य की कथा विभिन्न पुराणों में अलग-अलग ढंग से वर्णित है मगर जो एक बात सभी ग्रंथों में लिखी है उसके अनुसार श्री राधिका जी वृषभानु के यहां स्वयं प्रकट हुई थीं।

गर्ग संहिता में श्रीराधा की कथा

नारद और राजा बहुलाश्व के मध्य संवाद के माध्यम से कही गई है। नारद बहुलाश्व राजा से कहते हैं कि चक्रवर्ती राजा के पुत्र थे सुचन्द्र। पितरों के यहां संकल्पमात्र से तीन कन्याएं उत्पन्न हुई। जिनके नाम थे कलावती रत्नमाला और मेनका। कलावती चन्द्र के साथ ब्याही गई।

रत्नमाला विदेह (जनक) को समर्पित कर दी गई थी गिरिराज हिमालय ने मेनका से पाणिग्रहण किया। पितरों ने अपनी रुचि के अनुसार पूर्ण ब्रह्म विधि से ये कन्याएं दान की। रत्नमाला से सीता जी प्रकट हुई। मेनका के गर्भ से पार्वती का अवतार हुआ। चन्द्र अपनी पत्नी कलावती को साथ लेकर एक वन में चले गए।

वहां उन्होंने ब्रह्मा जी की तपस्या की। वह तप देवताओं के वर्ष से बारह वर्षों तक चलता रहा। तत्पश्चात् ब्रह्मा जी वहां पधारे और उन्हें अपने साथ स्वर्ग में ले गए। उनसे कहा गया कि समय आने पर तुम दोनों पृथ्वी पर उत्पत्र होंगे। द्वापर के अंत में गंगा और यमुना के बीच भारत देश में तुम्हारा जन्म होगा। तुम्हीं दोनों से स्वयं परिपूर्णतम भगवान श्री कृष्ण की प्राण प्रिया देवी राधिका जी पुत्री के रूप में प्रकट होगी। उसी समय तुम्हें परमधाम प्राप्त होगा।

ब्रह्मा जी के प्रभाव से भूमंडल पर कीर्ति तथा वृषभानु हुए। माता यशोदा का राधिका को देखने आना माता यशोदा को जब यह समाचार मिला कि राजा वृषभानु के घर राधा पधारी है, तो वह कृष्ण लल्ला को संग लेकर नगरवासियों सहित राधा रानी के दर्शनों को गई। श्रीकृष्ण को देखते ही राधा रानी ने अपने नेत्र खोल दिए और मुस्कराने लगी। चूंकि वह स्वयं ईश्वर की अंतरंग शक्ति थी इसलिए अपने स्वामी श्री कृष्ण के दर्शन करने के बाद ही उन्होंने ब्रह्मजगत पर : दृष्टिपात किया।

तत्पश्चात नारदमुनि राधा रानी के दर्शन करने हेतु बरसाना पधारे। उन्होंने राजा से कहा कि मैं नारद हूं। और मैं हीरापुर से राधा रानी के दर्शन करने आया हूँ। राजा वृषभानु ने नारद को प्रणाम किया और भीतर ले गए। नारद जी राधा रानी के दर्शन करते ही सुधबुध खो बैठे और नृत्य करने लगे।

ऐसे करें श्री राधाष्टमी व्रत

नारद पुराण में श्री जन्माष्टमी व्रत के बारे में कहा गया है कि भाद्रपद की शुक्ल अष्टमी को अपने घर में कलश स्थापित करके उसके ऊपर श्री राधा जी की स्वर्ण प्रतिमा का पूजन करें। मध्याह्नकाल में श्री राधा जी का पूजन करके व्रत करें। विधिपूर्वक राधाष्टमी व्रत रखने से मनुष्य व्रज का रहस्य जान लेता है तथा राधा परिकरों में निवास करता है। पद्म पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति राधा अष्टमी का व्रत रखता है वह सुखी, धनी और सर्वगुण समान हो जाता है जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्री राधा मंत्र का जाप करता है अथवा नाम स्मरण ही करता है, यदि वह धर्मार्थी हो तो धर्म प्राप्त करता है, कामार्थी हो तो पूर्ण काम हो जाता है और अगर मोक्षार्थी हो तो मोक्ष प्राप्त करता है। कृष्ण भक्त वैष्णव सर्वदा अनन्यचरण होकर जब श्री राधा की भक्ति प्राप्त करता है तो सुखी, विवेकी एवं निष्काम हो जाता है।


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