धर्म के लिए किसी को भी छोड़ा जा सकता है, लेकिन किसी के लिये भी धर्म को नहीं.. दिनेश मालवीय

धर्म के लिए किसी को भी छोड़ा जा सकता है, लेकिन किसी के लिये भी धर्म को नहीं.. दिनेश मालवीय
dineshधर्म के लिये किसी को भी छोड़ा जा सकता है, 

किसी के लिये भी धर्म को नहीं,

प्रहलाद, राजा बलि, विभीषण, भरत के जीवन के प्रेरक प्रसंग ...

धर्म का मर्म बहुत गूढ़ है। इसकी सूक्ष्मता को समझना बहुत कठिन है। हम इसी विषय पर आज चर्चा करेंगे। हम अपने गौरवमय अतीत के पृष्ठ उलटकर उन महान लोगों की चर्चा करेंगे, जिन्होंने धर्म के लिये बहुत बड़े त्याग किये।



भारत अनादिकाल से धर्मप्राण देश रहा है। इसके प्राण धर्म में बसते हैं। भारतीय जीवन और धर्म दर्शन कहता है कि धर्म के लिये किसी का भी त्याग किया जा सकता है, लेकिन किसी के लिये भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिये। इस जीवन में सर्वोपरि माना गया है।

भारत मे धर्म का वह अर्थ नहीं है, जो मजहब और रिलीजन का होता है। यहाँ धर्म सत्य और कर्तव्य का पर्यायवाची है। सत्य के साथ खड़े होने, उसकी रक्षा के लिये किसी भी त्याग से पीछे नहीं हटना और अपने कर्तव्य के पालन को ही धर्म माना गया है।

आइये, हम कुछ ऐसे महान लोगों की चर्चा करेंगे, जिन्होंने सत्य के लिये अपने सबसे प्रिय और पूज्य लोगों से नाता तोड़ दिया। सबसे पहले हम भक्त शिरोमणि प्रहलाद की चर्चा करेंगे। भक्ति के आकाश में प्रहलाद की चमक ध्रुव तारे की तरह है।

राक्षस कुल मे हिरण्यकश्यप के पुत्र के रूप मे जन्म लेकर भी उन्होंने ईश्वर भक्ति से अपने कुल को धन्य किया। उनका पिता स्वयं को भगवान मानता था। उसके राज्य मे ईश्वर,विशेषकर श्री हरि विष्णु को मानने की मना ही थी। इसका उल्लंघन करने वालों को मृत्युदंड दिया जाता था।

जीवन भी कितनी विचित्र स्थितियां सामने लाता है। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रहलाद महर्षि नारद के सम्पर्क मे आकर परम विष्णु का भक्त बन गया। पिता ने बहुत तरह से उसे समझाया, लेकिन भक्ति रूपी काली कमली पर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ता। प्रहलाद को अनेक प्रकार की प्रताणनाएँ दी गयीं। उसे अनेक तरह से मारने की कोशिशें की गयीं। लेकिन जा को राखे साइयां मार सके न कोय। बाल न बाँका कर सके, जो जब बैरी होय।

प्रहलाद ने अपने पिता को भगवान होने का भ्रम त्याग कर भगवान की शरण मे जाने के लिए बहुत समझाया, लेकिन वह अहंकारी और अधिक उग्र होता गया। प्रहलाद ने धर्म और सत्य की रक्षा के लिए अपने पिता का त्याग कर दिया।

प्रहलाद के पोतेराजा बलि ने भी अपने पितामह का अनुसरण कर जीवन मे सत्यनिष्ठा और धर्म को सबसे ऊपर रखा। बलि एक महान दानदाता था। उसके द्वार से कभी कोई याचक ख़ाली हाथ नहीं जाता था। भगवान विष्णु ने वामन रूप रखकर जब उससे तीन पग ज़मीन माँगी तो उसने इसे देने का संकल्प कर लिया। बलि के गुरु दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने विष्णुजी को पहचान लिया। उसने बलग से कहा कि विष्णुजी उसके साथ छल कर रहे हैं। लेकिन वह संकल्पबद्ध हो चुका था। संकल्प को पूरा करना और याचक को वांछित दान देना उसका धर्म था। लिहाजा उसने अपने गुरु का त्याग कर दिया।

रामकथा मे लंकेश्वर रावण के भाई विभीषण का उदाहरण भी बहुत श्रेष्ठ है। वह सात्विक स्वभाव के विष्णु भक्त थे। उन्होंने रावण को हमेशा बुराई के रास्ते से हटकर सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। लेकिन अपने बल और वैभव के घमंड मे चूर रावण ने उनकी बात कभी नहीं मानी।

रावण जब सीताजी का हरण कर लाया, तो विभीषण ने उसे बहुत समझाया कि वह सीताजी को सम्मान के साथ श्रीराम को लौटा दे। विभीषण ने एक बार जब रावण को फिर से ऐसा करने को कहा, तो उसने उन्हें भरे दरबार मे लात मारकर ज़मीन पर गिरा दिया।

ऐसी स्थिति मे विभीषण ने सत्य और धर्म का साथ देने के लिये अपने परम बलशाली भाई और राजसुख का त्याग कर दिया। श्रीराम के छोटे भाई भरत का उदाहरण तो बहुत अनूठा है। मनुष्य को सबसे अधिक प्रेम माँ से होता है। माँ की आज्ञा को बिना विचार किये तत्काल मानने की शास्त्रों में आदेश है। लेकिन भाई श्रीराम के विरुद्ध माँ के द्वारा किये गये षड्यंत्र से वह इतने अधिक क्षुब्ध हो गये कि उन्होंने अपनी माता का त्याग कर दिया। उन्होंने उसकी बहुत कठोर शब्दों मे निन्दा की और उसके कृत्य को पूरी तरह धर्म विरुद्ध बताया।

भरत ने उसके बाद जीवन भर कैकेई को कभी माता नहीं कहा। वह उन्हें महारानी कैकेयी कहते रहे। इस तरह हम देखते हैं कि हमारे धर्मदर्शन मे यही शिक्षा दी गयी है कि अधर्म करने वाले किसी भी व्यक्ति का साथ नहीं देना चाहिए, चाहे उसका आप से कोई भी संबंध हो। धर्म के लिये कुछ भी छोड़ा जा सकता है, लेकिन किसी के लिये भी धर्म को नहीं।


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