सीएम और उनके परिवारजनों पर उज्जैन में जमीन खरीदी और सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से लाभ कमाने के आरोप लगाए जा रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में इस पर ब्यौरा प्रकाशित किया गया है. इसी खबर पर कांग्रेस ने राजनीति शुरु की. प्रेस कांफ्रेंस करके आरोपों को दोहराकर भोपाल और दिल्ली में मीडिया के सामने करप्शन के आरोप लगाए गए. 

    बीजेपी मंत्रियों और सीएमओ की ओर से इस पर जो स्पष्टीकरण सामने आए उनमें यही कहा जा रहा है, कि सीएम, उनकी पत्नी तथा पुत्र के पास जितनी भूमि गत विधानसभा चुनाव के समय दिए शपथ पत्र में घोषित की गई है, उसमें कोई वृद्धि नहीं हुई है. स्पष्टीकरण में इसका कोई उल्लेख नहीं है, कि सीएम के परिवार पर मीडिया रिपोर्ट में जिन भूमियो को खरीदने का विवरण दिया गया है, क्या यह सब कुछ गलत है. अगर यह बेबुनियाद है, तो फिर निश्चित रूप से संबंधित समाचार पत्र के खिलाफ कानूनी कार्यवाही तुरंत शुरु की जाना चाहिए. 

    राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप समझा जा सकता है, लेकिन अगर कोई अखबार कोई खोजी खबर प्रकाशित कर रहा है, तो वह तो सीएम का प्रतिद्वंदी नहीं है. जो भी तथ्य हैं, वह बयान या आरोपों से ना तो साबित होंगे और ना ही खारिज किए जा सकते हैं. जमीनें रिकॉर्ड पर ही खरीदी और बेची जाती हैं. उसका रिकॉर्ड कभी खत्म नहीं होता. जमीन खरीदना अपराध नहीं है, अगर इस खरीदी के पीछे मास्टर प्लान की संभावित योजनाओं की पूर्व जानकारी लीक होना आधार है तो फिर यह अपराध की श्रेणी में है. जहां नीट और सीबीएसई जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं के पेपर लीक हो सकते हैं, वहां मास्टर प्लान का लीक होना असंभव तो नहीं कहा जा सकता. 

    जमीनी सच्चाई कागजी स्पष्टीकरण से छिपाई नहीं जा सकती है. जमीनी सच्चाई सामान्य धारणा में सबको ज्ञात होती है. प्रथम दृष्टि में यह तो लगता है, कि उज्जैन के आसपास जमीनों की खरीद बिक्री का बड़ा खेल चल रहा है. सिंहस्थ महाकुंभ आयोजन के पहले वहां बड़ी संख्या में अधोसंरचना के प्रोजेक्ट भी लाए जाते हैं.

    इसके पहले उज्जैन सिंहस्थ में अपनी जमीन जाने के नाम पर किसानों द्वारा भी आंदोलन किया गया था. सरकार की ओर से जो भी प्रस्ताव किया गया था, उसको बाद में वापस लिया गया. महाकाल की नगरी से पहली बार मुख्यमंत्री बने हैं. महाकाल लोक बनने के बाद दूसरे तीर्थ स्थलों के समान ही उज्जैन में भी अधोसंरचना के विकास पर भारी निवेश हो रहा है. 

    जमीन की खरीदी और बाद में वहां से सरकारी प्रोजेक्ट्स आने पर उनकी कीमतों में बेतहाशा वृद्धि से लाभ कमाने का कोई यह पहला मामला नहीं है, यह तो राजनीति का बिजनेस मॉडल ही बन गया है. सीधे-सीधे सरकारी पद से लाभ कमाने में बदनामी को देखते हुए इस तरह की प्रक्रिया से धन कमाने का अवसर भी मिल जाता. और कानूनी रूप से कोई प्रक्रिया का उल्लंघन भी नहीं होता है. हितों का टकराव अगर होता भी है तो यह नैतिक प्रश्न होता है. नैतिकता की कल्पना राजनीति से करना आज के जमाने में तो दिवा स्वप्न ही लगता है.

    सीएम और उनके परिवार द्वारा जमीन खरीदी के संबंध में जो भी फैक्ट्स सामने आए हैं, उस पर कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता. उनकी रजिस्ट्री भी बाहर आएगी. अगर वहां से सरकारी प्रोजेक्ट निकले हैं तो वह सच्चाई भी जमीन पर दिखाई पड़ेगी.

    जमीन की खरीदी और सरकारी परियोजनाओं का लाभ लेकर धन कमाने के आरोपों की खबर आने के बाद कांग्रेस की राजनीति ने इस पूरे मामले में एक तरीके से प्रोटेक्शन का काम किया है. राजनीति में सच्चाई तो किसी को नहीं पता. इसमें विश्वसनीयता सबसे बड़ा पैमाना होता है. जो पकड़ा जाता है, वही दोषी होता है. जहां तक हितों के टकराव का मामला है तो हर जनप्रतिनिधि इस नैतिकता के पैमाने पर 24 कैरेट की शुद्धता स्थापित करने में अक्षम साबित होगा. 

    कांग्रेस के जो चेहरे दिल्ली और भोपाल में सीएम मोहन यादव के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं, उन चेहरों की विश्वसनीयता ही सवालों के घेरे में है. कुछ दिन पहले ही जीतू पटवारी की यह सच्चाई सामने आई है, जिसमें वह वेयर हाउस के धंधे में उसी सरकार की संस्था से कमाई करते हैं जिस सरकार से वह लड़ाई लड़ रहे हैं. केवल पटवारी ही नहीं प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थित सभी चेहरों की सच्चाई अगर तलाशी जाएगी तो उनकी राजनीति शुरु करने की स्थिति और वर्तमान समृद्धि में उनके सिद्धांत और हितों के टकराव की सच्चाई देखी जा सकती है.

      राजनीति में ना कोई दोस्त होता है ना दुश्मन. सत्ता की राजनीति में अपनों के बीच में प्रतिस्पर्धा आम बात है. विरोधी तो कई बार मददगार साबित हो जाते हैं लेकिन आस्तीन में बैठे लोग ज्यादा खतरनाक साबित होते हैं. 

    करप्शन और अपराधिक कृत्य के मामले में कानूनी प्रक्रिया ही कोई निष्कर्ष बन सकती है. राजनीतिक प्रक्रिया तो केवल भटकाने का प्रयास ही साबित होती है. राज्य में पहले भी ऐसी खबरें आई हैं. भोपाल पश्चिमी बाईपास के आसपास आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने पहले भूमि खरीदी फिर वहां से बाईपास निकला. इससे इन अफसरों को करोड़ों की मूल्य वृद्धि मिली. ऐसा ही आरोप उज्जैन भूमि विवाद में भी लगाया जा रहा है.

    अगर अखबार ने खबर भ्रामक छापी है तो सीएम और उनके परिवार की ओर से निश्चित कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी. अखबार भी अपनी सच्चाई साबित करेगा और सीएम को भी इसका मौका मिलेगा.

    इतना तय है, कि अवधारणा कभी झूठ नहीं बोलती. अवधारणा का वर्डिक्ट चुनाव में आता है.  भाजपा की यही विशेषता है, कि वह अवधारणा को समझने में कोई गलती नहीं करती.